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Friday, January 6, 2017

हनुमान मंदिर पनकी : आस्था एवं विश्वास का सैलाब

  
        'आस्था एवं विश्वास" का सैलाब देखना हो तो कानपुर में 'पनकी वाले बाबा" के दरबार चलें। यूं कहें कि आस्था एवं विश्वास का सैलाब में शामिल हों। 'पनकी वाले बाबा" अर्थात 'हनुमान मंदिर पनकी" लोककल्याणक माने गये। लोककल्याणक हनुमान जी के दर्शन करने शहर के श्रद्धालु ब्राह्म मुहूर्त में ही दरबार पहंुच जाते हैं। 

         'बाबा का दरबार" ऐसा 'कोई खाली न गया"। बुढ़वा मंगल पर तो पांच लाख या इससे भी अधिक श्रद्धालुओं की भारी भीड़ दर्शन के लिए उमड़ती है। कभी शहर बाहर किन्तु अब शहरी सीमा में आने वाला पनकी भी बाबा के नाम से ही जाना जाता है। महाभारतकाल के इस मंदिर में श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास की धारा तो अनवरत दिखती है लेकिन बुढ़वा मंगल पर सैलाब दिखता है। मान्यता है कि हनुमान जी का यह मंदिर करीब चार सौ साल या इससे भी अधिक पुराना है। विशेषज्ञों की मानें तो हनुमान जी यह मंदिर महाभारत काल में अस्तित्व में आ चुका था। 

           किवदंती है कि महाभारतकाल में कौरवों ने पाण्डव को  हस्तिनापुर से निकाल दिया था। पाण्डव ने शिवली के जंगलों में कई वर्ष तक प्रवास किया। नदी में पाण्डव स्नान करते थे। इस नदी को अब पाण्डु नदी कहा जाता है। किवदंती यह भी है कि पाण्डव ने कन्नौज से नदी को शिवली तक लाने के लिए एक वर्ष तक खोदाई की थी। शिवली के जंगल में विचरण के दौरान भीम को हनुमान जी विशाल छवि-मूर्ति मिली जिसे वह कंधे पर रख कर जंगल से बाहर लेकर आये। पनकी में एक वृक्ष के नीचे मूर्ति रख दी। इसी स्थान पर हनुमान जी का मंदिर बना। 

         श्रद्धालुओं को बाबा अपने तीन स्वरुपों में दर्शन देते हैं। सुबह दर्शन करने पर हनुमान जी सूर्य की आभा से आलोकित बाल स्वरुप में दर्शन देते हैं तो वहीं दोपहर में युवा स्वरुप में दर्शन होते हैं। सांझ को बाबा महापुरुष के रुप में भक्तों के कल्याणक बनते हैं। मंदिर में हनुमान जी की भव्य-दिव्य प्रतिमा प्राण-प्रतिष्ठित है। प्रतिमा रजत अर्थात चांदी की आभा से आलोकित है। दिव्य-भव्य मंदिर निरन्तर दिव्यता एवं भव्यता को हासिल कर रहा है। शासकीय व्यवस्थाओं के तहत मंदिर परिसर सहित आसपास के क्षेत्र का सौन्दर्यीकरण भी किया गया। 

           श्रद्धालुओं की आस्था एवं विश्वास है कि बाबा 'हनुमान जी" को लड्डू भोग लगाने से मनोकामनायें पूर्ण होती हैं तो श्रद्धालु देशी घी का दीपक जलाते-प्रज्जवलित करते है। विश्वास है कि दीपक जलाने-प्रज्जवलित करने से इच्छित वरदान प्राप्त होता है। हनुमान जी यह मंदिर पनकी वाले बाबा के नाम से आसपास ही नहीं दूरदराज तक ख्याति प्राप्त है।   

Thursday, January 5, 2017

सरसैया घाट : 

गंगा आरती की दिव्यता-भव्यता

  
       ब्रिटिश हुकूमत रही हो या लोकतांत्रिक व्यवस्था, मोक्षदायिनी 'गंगा" आैर 'गंगाजल" बाशिंदों की आस्था एवं विश्वास में सदैव रहे। भारत के खास प्रदेश उत्तर प्रदेश के कानपुर में गंगा नदी का अपना एक अलग वेग-आवेग रहा। कानपुर को यूं ही छोटी काशी नहीं कहा जाता क्योंकि कानपुर के बाशिंदों में आचरण-संस्कार काफी कुछ काशी से मिलते-जुलते दिखते हैं। मंदिरों में घंटा-घडियाल की टंकार तो सुबह गंगा स्नान.... हर-हर गंगे... हर-हर महादेव का जयघोष एक धार्मिक एवं आध्यात्मिक शहर को व्यक्त-बयां करता है।

               शहर के प्रमुख गंगा घाटों में एक 'सरसैया घाट" भी है। जिला मुख्यालय के नजदीक 'सरसैया घाट" को भी कई बार अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। आजादी से पहले व स्वाधीनता के कुछ समय बाद तक 'सरसैया घाट" गंगा श्रद्धालुओं से आबाद रहता था लेकिन तीन से चार दशक के बीच गंगा शहर के मुख्य घाटों से रुष्ट हो गयी। गंगा को घाटों तक लाने के लिए आंदोलन से लेकर खोदाई तक हुयी। सरसैया घाट पर खोदाई का मुख्य श्रमदान चला। गंगा को घाटों पर लाने के लिए श्रमदान में फिल्म एवं धारावाहिक निर्माता रामानन्द सागर, अरविन्द त्रिवेदी, दीपिका चिखलिया, अरुण गोविल सहित असंख्य नामचीन हस्तियां शामिल हुयीं। शनै:-शनै: खण्डहर हो चले सरसैया घाट को एक बार फिर सजाया-संवारा गया। सुन्दरीकरण से गंगा के सरसैया घाट की तस्वीर तो बदली लेकिन 'गंगधारा" घाट पर नहीं आ सकी।

           सरसैया घाट पर ही स्वाधीनता आंदोलन से ताल्लुक रखने वाला गंगा मेला भी लगता है। इस मेला में लाखों शहरी-बाशिंदे शामिल होते हैं। चूंकि सरसैया घाट जिला मुख्यालय के निकट है लिहाजा ग्रामीण इलाकों के बाशिंदे भी गंगा स्नान के लिए इसी घाट पर आते हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा-सहूलियत के लिए घाट पर ही गोकुल प्रसाद धर्मशाला भी है। शहर के धर्मावलम्बियों ने स्वाधीनता आंदोलन से पहले धर्मशला का निर्माण कराया था। सरसैया घाट पर शिवालय श्रंखला भी है। श्रद्धालुओं के कल्याणार्थ एवं जनसेवार्थ आयोजन भी होते हैं। अभी कुछ वर्षों से सरसैया घाट पर गंगा जी की आरती का भव्य-दिव्य आयोजन प्रारम्भ हुआ। गंगा आरती की दिव्य-भव्य छटा निहारते ही बनती है। 

Wednesday, January 4, 2017

मुक्ता देवी के दर्शन, पल-क्षण छवि में बदलाव

  
       मान्यताओं-परम्पराओं का कोई अंत नहीं। आश्चर्य-अचरज भी कम नहीं। देश-विदेश के वैज्ञानिक-विशेषज्ञ भी भौचक रह गये। भगवती माता मुक्तेश्वरी देवी की छवि में बदलाव होना, किसी आश्चर्य से कम नहीं। श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का यह केन्द्र 'मुक्तेश्वरी देवी मंदिर" के तौर पर प्रख्यात है। इस मंदिर को मुुक्ता देवी के नाम से भी जाना जाता है। 


            भगवती मुक्ता देवी के दर्शन में पल-क्षण हर बार छवि में बदलाव महसूस करेंगे। यह कोई किवदंती नहीं, हकीकत है। छवि में निरन्तर बदलाव श्रद्धालुओं को आश्चर्य में डालता है। उत्तर प्रदेश के कानपुर में मुगल रोड पर मूसानगर है। मूसानगर वस्तुत: राजा-रजवाडों की राजधानी रहा है। सिठउपुरवा राज्य के राजा दैत्यराज बलि के शासनकाल में मूसानगर राज्य की  राजधानी रहा। यह समिश्रित क्षेत्र है क्योंकि एक ओर मूसानगर शहरी क्षेत्र से ताल्लुक रखता है तो वहीं यह इलाका चम्बल का हिस्सा भी माना जाता है। लोकगाथा की मानें तो यमुना नदी के किनारे स्थित यह भव्य-दिव्य मंदिर मुगल शासनकाल का माना जाता है।

            मान्यता है कि भगवती मुक्ता देवी के दर्शन करने मात्र से श्रद्धालुओं की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इस मंदिर की छवि सुहागिनों के कल्याणार्थ भी मान्य है। मुक्ता देवी का यह मंदिर परिसर एवं आसपास का क्षेत्र त्रेतायुग का इतिहास खुद-ब-खुद रेखांकित करता है। प्राचीन काल के अवशेष, प्रतिमायें एवं खण्डर त्रेतायुग से लेकर मुगलकाल की गाथा को खुद ही ब्यक्त-बयां करते हैं। दैत्यराज बलि की राजधानी मुक्ता नगर होने से इस क्षेत्र का नाम मूसा नगर एवं देवी स्थान का नाम मुक्ता देवी मंदिर प्रख्यात हुआ। देव, यक्ष एवं राजाओं की राजधानी होने के कारण इस क्षेत्र को देवलोक का दर्जा हासिल रहा। आसपास के साम्राज्य पर जीत हासिल करने के लिए दैत्यराज बलि ने विधि-विधान से 99 यज्ञ का अश्वमेघ यज्ञ कराया था। अभी भी उत्तरगामिनी में हवन-पूजन-अर्चन एवं यज्ञ की परम्परा है। विशेषज्ञों की मानें तो मंदिर की प्रतिमाओं से लेकर जर्जर खण्ड व अन्य अवशेष 50 से 2600 वर्षकाल के पुराने लगते हैं। 

            मंदिर क्षेत्र पठारी उबड़-खाबड़ एवं चम्बल का एहसास कराता है। मंदिर के पाश्र्व हिस्से से यमुना नदी का जल कोलाहल अवलोकित होता है तो प्रवेश क्षेत्र में शहरी आब-ओ-हवा महसूस होती है। शारदीय एवं चैत्र नवरात्र में भव्य-दिव्य मेला लगता है। जिसमें भारी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही होती है। भगवती मुक्तेश्वरी देवी के दर्शन करने हों तो शहर कानपुर से करीब पचास किलोमीटर की यात्रा करनी होगी।      


Tuesday, January 3, 2017

वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बेहटा का 'जगन्नाथ मंदिर"

  
       वैज्ञानिक भी रहस्य नहीं खोज सके। उत्तर प्रदेश के कानपुर के भीतरगांव का भगवान 'जगन्नाथ मंदिर" श्रद्धा-उपासना एवं आस्था का केन्द्र-स्थल है तो वहीं वैज्ञानिकों के लिए एक 'चुनौती" है। 

           चुनौती रहस्य खोजने या कारण तलाश करने की है। बेहटा-भीतरगांव का भगवान 'जगन्नाथ मंदिर" अपने अस्तित्व में काफी कुछ खास समेटे है। यह अजूबा ही है कि मानसून अर्थात बारिश का मौसम आने से पहले ही मंदिर 'सूचना" दे देता है कि बारिश आने वाली है। मानसून आ चुुका है। मानसून आने से पहले मंदिर की छत से पानी टपकने लगता है। मंदिर करीब एक सप्ताह पहले मानसून की सूचना देता है।

           आश्चर्य है कि चिलचिलाती धूप में मंदिर की छत से पानी टपकने लगता है तो मानसून आने के बाद छत से पानी टपकना एकदम बंद हो जाता है। इस भव्य-दिव्य मंदिर को 'मौसम मंदिर" के तौर पर भी ख्याति है। इस रहस्य को जानने के कई प्रयास हो चुके हैं। पुरातात्विक विभाग के विशेषज्ञ एवं वैज्ञानिक दल ने कई बार अध्ययन एवं अवलोकन किया लेकिन छत से पानी टपकने का रहस्य नहीं खोज सके।  विशेषज्ञों की मानें तो बेहटा भीतरगांव के इस मंदिर का निर्माण 6 वीं शताब्दी में किया गया था। यह काल भारत का स्वर्णिम गुप्तकाल रहा। करीब 68.25 फुट ऊंचाई वाले शिखर एवं छत की संरचना में प्राचीनता की झलक साफ तौर पर दिखती है। 

          इस मंदिर के निर्माण में खास र्इंटों का इस्तेमाल किया गया है। करीब 18 इंच लम्बी, 9 इंच चौड़ी व तीन इंच मोटाई वाली र्इंटों का उपयोग किया गया। मंदिर करीब 36 फुट चौड़े एवं 47 फुट लम्बे प्लेटफार्म पर बना है। मंदिर की दीवारों की मोटाई भी कम नहीं है। दीवार की मोटाई कहीं-कहीं 8 फुट तक है। मंदिर का डिजाइन गुम्बदाकार मेहराब पर आधारित है। विशेषज्ञों की मानें तो इस शैली का उपयोग भारत में पहली बार किया गया था। कुछ यूं कहें कि मंदिर वास्तुकला का नायाब निर्माण है। करीब 15 फुट लम्बे एवं चौडे गर्भगृह की ऊंचाई भी दो मंजिल से कम नहीं। गर्भगृह की दर-ओ-दीवार पर देवी सीता के अपहरण से लेकर नर-नारायण की छवियां उकृष्ट दिखती हैं। हिन्दू अवधारणा का साक्षात अवलोकन यहां होता है। 

         हिन्दुओं की आस्था एवं विश्वास का यह स्थान 'लोककल्याणार्थ" भी जाना जाता है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ एवं सुभद्रा सहित अन्य देवगण विराजमान हैं। पूजन-अर्चन एवं हवन आदि धार्मिक अनुष्ठान नियमित होते रहते हैं। मनौती के लिए श्रद्धालु दूर-दराज से आते हैं। शहर के ग्रामीण इलाके में होने के कारण मंदिर में अत्यधिक भीड़ तो नहीं होती लेकिन आसपास के इलाकों के बाशिंदों के मांगलिक कार्य अर्थात मुण्डन-कर्णछेदन संस्कार आदि होते हैं। मंदिर की बनावट बौद्ध मठ की भांति है। विशेषज्ञों का आंकलन है कि सम्राट अशोक के शासनकाल की वास्तुकला भी दिखती है तो वहीं चक्रवर्ती सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल के भी कयास लगाये जाते हैं। निर्माण में टेराकोटा शैली की भी झलक मिलती है तो वहीं वास्तुकला भी गजब है।     

Monday, January 2, 2017

मनौती के लिए मां काली के मंदिर में ताला 


     आस्था, श्रद्धा व विश्वास हो तो निश्चय ही मनोकामनायें पूर्ण होंगी। आस्था, श्रद्धा व विश्वास के कारण ही मां काली के दरबार में नित्य भारी संख्या में श्रद्धालुओं-भक्तों की भीड़ उमड़ती है। जी हां, उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के ह्मदय स्थल शिवाला बंगाली मोहाल में मां काली का दिव्य-भव्य मंदिर है। 

       बंगाली मोहाल का मां काली का यह विशाल मंदिर पांच सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। शहर की घनी आबादी वाले इलाके बंगाली मोहाल स्थित इस मंदिर में मां काली अपने पूर्ण स्वरुप में प्रतिष्ठापित हैं। नवरात्र में मां काली का विशाल नवरात्र उत्सव का आयोजन होता है। मां काली के इस दिव्य-भव्य स्थान पर मनौती मानने के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु, भक्त व जरुरतमंद आते हैं। मां काली के दर्शन-पूजन-अर्चन के साथ ही मान्यता व परम्परा है कि मनौती के लिए ताला (लॉक) अवश्य लगायें। मान्यता है कि मंदिर में ताला लगाने-बंद करने से श्रद्धालुओं-भक्तों की मनौती निश्चय ही पूर्ण होती है।

             मनौती पूर्ण होने पर श्रद्धालुओं को ताला खोलने के लिए मंदिर आना पड़ता है। मां काली के इस विशाल मंदिर में चौतरफा छोटे-बड़े बंद ताले लगे-लटकते दिख जायेंगे। बताते हैं कि ताला के रुप में श्रद्धालु-भक्त की इच्छा या मनौती उस स्थान पर बंद हो जाती है। इस इच्छा या मनौती को मां काली अवश्य पूर्ण करती हैं। यह ताले श्रद्धालुओं ने अपनी मनौती के लिए लगाये हैं। बताते हैं कि वर्षों से यह मान्यता-परम्परा अनवरत चली आ रही है। मनौती के ताला लाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मंदिर परिसर के बाहर पूजन-अर्चन की सामग्री बेचने वाले दुकानदारों के पास ताला उपलब्ध हो जाता है। बताते हैं कि बंगाली मोहाल के इस मंदिर की स्थापना एक बंगाली परिवार ने की थी लेकिन अब इस मंदिर की देखरेख-देखभाल द्विवेदी परिवार करता है।

          बंगाली मोहाल में आज भी बड़ी संख्या में बंगाली परिवार रहते हैं। मां काली जी का नित्य निर्धारित परम्परा के अनुसार पूजन-अर्चन किया जाता है। परिधान पहनाने से लेकर श्रंगार तक सभी आवश्यक पूजन व्यवस्थायें व आरती सभी कुछ समय से सुनिश्चित किया जाता है। बंगाली संस्कृति व परम्पराओं का पालन किया जाता है। नवरात्र में सप्तमी, अष्टमी व नवमी को मां काली जी का विशेष पूजन अर्चन  होता है। दीपावली पर काली जी की महापूजा आयोजित होती है। बंगाली परिवारों के अलावा अन्य हिन्दू परिवार मां काली के इस दिव्य-भव्य स्थल पर बच्चों के मुण्डन संस्कार एवं कर्ण छेदन संस्कार सहित अन्य संस्कार भी कराते हैं। विशेष उत्सव पर मां काली के दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं-भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
                          

Sunday, January 1, 2017

'सीसामऊ बाजार" गरीबों का मेगामॉल

  
       'सीसामऊ बाजार" गरीबों का मेगामॉल। जी हां, आैद्योगिक शहर कानपुर का सीसामऊ बाजार गरीबों की हर खास-ओ-आम आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति करता है। 
          चाहे परिधान खरीदने हों या फिर चुल्हा-चौका एवं घर-गृहस्थी का कोई सामान खरीदना हो, सभी कुछ इस बाजार में आसानी से मिलेगा। वह भी काफी किफायती दामों पर उपलब्ध होंगे। करीब तीन से पांच वर्ग किलोमीटर दायरे में फैला सीसामऊ बाजार सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। शहर के जरीब चौकी चौराहा से पी रोड पर बजरिया चौराहा के बीच पड़ने वाला सीसामऊ बाजार खास तौर से महिलाओं के परिधान एवं रेडीमेड गारमेंट्स के लिए जाना जाता है लेकिन उपलब्ध सब कुछ होगा। सीसामऊ बाजार खास तौर से पी रोड के पश्चिमी इलाके को कहा जाता था लेकिन अब बाजार का विस्तार काफी लम्बे-चौड़े एरिया में हो चुका है। 
            सीसामऊ बाजार पूर्व में पी रोड व इसके आगे तक का इलाका है तो पश्चिम में जवाहर नगर, उत्तर में लेनिन पार्क व दक्षिण में राम बाग इलाका तक फैला है। महिलाओं के साज-ओ-श्रंगार का हर सामान सीसामऊ बाजार में उपलब्ध है तो वहीं सीसामऊ बाजार में आभूषण का एक अलग बाजार-मार्केट है। महिलाओं के साज-ओ-श्रंगार का हर आभूषण उपलब्ध होता है। खासियत यह कि गरीब परिवार भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति इस आभूषण बाजार से कर सकते हैं। करीब डेढ़ दशक पहले यह बाजार लाटरी के लिए विख्यात ंहो गया था। लाटरी गुरु 'शर्मा जी" की ख्याति भी सीसामऊ बाजार से जुडी़ तो वहीं जवाहर नगर ढ़लान पर शूज, जूता-चप्पल-सैंडिल का बाजार विकसित हो गया। दलहन से लेकर हरी ताजी सब्जियां भी उपलब्ध कराता है यह बाजार।
             इस बाजार के पी रोड कार्नर पर कभी 'गोपाल टाकीज" हुआ करती थी लेकिन अब गोपाल टाकीज ने रेडीमेड मार्केट की शक्ल अख्तियार कर ली है। इस तरह से देखा जाये तो चौतरफा सीसामऊ बाजार का विस्तार हुआ। सीसामऊ बाजार जहां एक ओर उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति करता है तो वहीं बड़ी तादाद में गरीबों को रोजी-रोजगार के अवसर उपलब्ध कराता है। सैकड़ों ठेला-ठेलिया वाले इस बाजार से रोजी-रोटी कमाते हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि सीसामऊ बाजार के कारोबार का टर्नओवर एक अरब से अधिक हो। छोटे-बड़े दुकानदार-कारोबारियों को ही लें तो इनकी संख्यां भी पांच हजार से कम न होगी। कोई फुटपाथ पर दुकान लगा कर उपभोक्ताओं को उत्पाद की बिक्री करता है तो कोई आलीशान शोरुम से उपभोक्ताओं को लुभाता है।
         काफी लम्बे-चौड़े एरिया में सजने वाला यह बाजार उपभोक्ताओं-खरीददारों से हमेशा गुलजार रहता है। बच्चों को खिलौना दिलाना हो या बड़ों को सूट सिलवाना हो, कंहीं आैर जाने की जरुरत नहीं। सीसामऊ बाजार हर आवश्यकता की पूर्ति करेगा। सीसामऊ बाजार ने भी कई इतिहास रचे तो कई इतिहास देखे। कुछ भी हो सुई से लेकर सोने का हार तक सब कुछ उपभोक्ताओं को मुहैया कराने वाला यह बाजार देश-विदेश में भी जाना जाता है। 

Friday, December 30, 2016

हिन्दुस्तानियों की होली के सामने झुकी ब्रिटानिया हुकूमत 


      होली के इन्द्रधनुषी रंगों के सामने भी ब्रिटानिया हुकूमत को झुकना पड़ा था। जी हां, ब्रिाटानिया हुकूमत को हिन्दुस्तानियों की होली के सामने न केवल झुकना पड़ा बल्कि देश में एक नायाब परम्परा भी पड़ गयी।

       होली के देश भर में अजब-गजब रंग-ढंग दिखते हैं लेकिन कनपुरिया होली के अंंदाज ही निराले हैं। उत्तर प्रदेश के कानपुर में आैसतन एक सप्ताह तक होली का हुडदंग चलता है। रंग अबीर के छीटों-बौछारों से आठ दिनों तक शहर सराबोर रहता है। अनुराधा नक्षत्र  तक होरिहारों की मस्ती घर-गली, गलियारों से लेकर सड़कों तक दिखती है। उत्तर प्रदेश का कानपुर एक जमाने में एशिया का मैनचेस्टर का खिताब रखता था। आैद्योगिक कल-कारखानों से लेकर लघु उद्योगों से कानपुर आबाद था। मेहनतकश मजदूरों के लिए कानपुर जाना जाता था। देश के कोने-कोने, गांव-गलियारों के मजदूर यहां रोजी रोटी कमाते थे। खास तौर उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल यहीं बसता था। कानपुर का हटिया, नौघड़ा, लाठी मोहाल, राम गंज, शकरपट्टी, दाल मण्डी, नयागंज, जनरलगंज, सिरकी मोहाल व घुमनी मोहाल आदि सहित शहर के घनी आबादी वाले इलाकों में गरीबों व मजदूरों का आशियाना होता था।      

            मेहनतकश मजदूर दो तीन दिन होली का हुड़दंग करते थे। रंगों से सराबोर रहते थे। यह बात 1942 की है।  अंग्रेज हुक्मरानों को यह सब नागवार गुजरता था। एक  अंग्रेज अफसर ने एक दिन से अधिक होली खेलने पर रोक लगा दी। हुआ यह कि होरिहारे होली खेल रहे थे। उसी दौरान एक घुडसवार अंग्रेज अफसर गुजरा। होली का रंग उस अंग्रेज के उपर पड़ गया।  अंग्रेज अफसर गुस्से खूब लाल पीला हुआ। अंग्रेज अफसर ने एक दिन से अधिक होली खेलने पर रोक लगा दी। अंग्रेज कलक्टर ने इतना सख्त फरमान जारी कि एक दिन से अधिक जो भी होली खेलेगा, उसे गिरफ्तार कर लिया जायेगा। बस इस सांस्कृतिक गुलामी के खिलाफ शहर के बाशिंदों की फौज व मजदूर सड़कों पर उतर आये। कनपुरिया तेवर तीखे हो चले। शहर के बाशिंदों ने एक स्वर में आवाज बुलंद की कि अब एक दो दिन नहीं बल्कि एक सप्ताह होली खेलेंगे।

          इस एलान के साथ ही हटिया के रज्जन बाबू पार्क में इलाके के बाशिंदों ने तिरंगा झण्डा फहरा दिया। बस क्या था, अंग्रेज हुक्मरान बगावत करने वाले हिन्दुस्तानियों की खोजबीन में छापामारी करने लगे। तिरंगा फहराने वालों में लाला बुद्धू लाल, गुलाब चन्द सेठ, मूलचन्द सेठ, अमरीक सिंह, इकबाल कृष्ण कपूर, शिवनारायण, जागेश्वर त्रिवेदी, विश्वनाथ मेहरोत्रा, हरिमल मेहरोत्रा, रघुवर दयाल भट्ट, किशन शर्मा, कन्हैया लाल गुप्ता व पीताम्बर लाल आदि थे। इस एलान से शहर के बाशिंदे खास तौर से मजदूर खुशी से झूम उठे क्योंकि एक दो दिन के बजाय एक सप्ताह होली खेलने का मौका मिला। अंग्रेजी हुकूमत ने आदेश की अवज्ञा में लाला बुद्धू लाल, गुलाब चन्द सेठ सहित 43 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। विरोध में शहर के लोग सड़कों पर उतर आये। चारों ओर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ नारेबाजी होने लगी।

         आंदोलन के उग्र तेवर देख अंग्रेज हुक्मरानों की नींद हराम हो गयी। इस आंदोलन में हिन्दू, मुस्लिम सिख सभी शामिल थे। आंदोलन को देख कर अन्तोगत्वा अंग्रेज हुक्मरानों को झुकना पड़ा। सभी गिरफ्तार रिहा कर दिये गये। जिस दिन रिहाई की गयी, उस दिन अनुराधा नक्षत्र था। ज्योतिष के अनुसार अनुराधा नक्षत्र प्रतिष्ठान व दुकान, कारोबार खोलने के लिए शुभ माना जाता है। आंदोलनकारियों की रिहाई होने के बाद उसी दिन अनुराधा नक्षत्र में दुकानों को खोला गया। होली का रंग खेला गया। हटिया के रज्जन बाबू पार्क से होरिहारों का मेला निकला। एक भैंसा ठेला पर एक पुतला रख कर मेला निकाला गया। रंग खेलते होरिहारों की फौज शहर के विभिन्न सड़कों से होते हुये सरसैया घाट पहंुचे। गंगा में नहा धोकर रंग साफ किया। शाम को उसी स्थान सरसैया घाट पर मेला लगा। होली गंगा मेला की परम्परा आज भी कायम है।

        धीरे-धीरेे होली गंगा मेला का स्वरूप बढ़ता गया। होली के बाद सरसैया घाट पर शाम को भव्य दिव्य मेला लगता है। एक किलोमीटर से अधिक दायरे में लगने वाला होली गंगा मेला एक  भव्य सांस्कृतिक आयाम की शक्ल में दिखता है। होली गंगा मेला में सैकड़ों की तादाद में पाण्डाल लगते हैं। इनमें पुलिस प्रशासन, जिला प्रशासन, नगर निगम, बैंक, राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, सांस्कृतिक संस्थाओं सहित अनेकानेक प्रकार के पाण्डाल लगते हैं। ठंडई से लेकर पान, लौंग, इलाइची व सौंफ सहित बहुत कुछ इन पाण्डालों में सेवाभाव व  मिलनचार में उपलब्ध रहता है। शहर की राजनीतिक हस्तियां भले देश की शीर्ष सत्ता में हों लेकिन होली गंगा मेला में आना नहीं भूलते। दोपहर से प्रारम्भ होकर होली गंगा मेला देर रात तक चलता रहता है। होली से लेकर अनुराधा नक्षत्र तक शहर रंगों से सराबोर रहता है। हटिया होली गंगा मेला के संयोजक ज्ञानेन्द्र विश्नोई ज्ञानू कहते हैं कि कानपुर का होली गंगा मेला एक परम्परा के साथ ही सांस्कृतिक गुलामी के खिलाफ एक जंग की याद भी है। अब तो होली गंगा मेला एक सांस्कृतिक धरोहर की भांति है।