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Monday, January 2, 2017

मनौती के लिए मां काली के मंदिर में ताला 


     आस्था, श्रद्धा व विश्वास हो तो निश्चय ही मनोकामनायें पूर्ण होंगी। आस्था, श्रद्धा व विश्वास के कारण ही मां काली के दरबार में नित्य भारी संख्या में श्रद्धालुओं-भक्तों की भीड़ उमड़ती है। जी हां, उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के ह्मदय स्थल शिवाला बंगाली मोहाल में मां काली का दिव्य-भव्य मंदिर है। 

       बंगाली मोहाल का मां काली का यह विशाल मंदिर पांच सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। शहर की घनी आबादी वाले इलाके बंगाली मोहाल स्थित इस मंदिर में मां काली अपने पूर्ण स्वरुप में प्रतिष्ठापित हैं। नवरात्र में मां काली का विशाल नवरात्र उत्सव का आयोजन होता है। मां काली के इस दिव्य-भव्य स्थान पर मनौती मानने के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु, भक्त व जरुरतमंद आते हैं। मां काली के दर्शन-पूजन-अर्चन के साथ ही मान्यता व परम्परा है कि मनौती के लिए ताला (लॉक) अवश्य लगायें। मान्यता है कि मंदिर में ताला लगाने-बंद करने से श्रद्धालुओं-भक्तों की मनौती निश्चय ही पूर्ण होती है।

             मनौती पूर्ण होने पर श्रद्धालुओं को ताला खोलने के लिए मंदिर आना पड़ता है। मां काली के इस विशाल मंदिर में चौतरफा छोटे-बड़े बंद ताले लगे-लटकते दिख जायेंगे। बताते हैं कि ताला के रुप में श्रद्धालु-भक्त की इच्छा या मनौती उस स्थान पर बंद हो जाती है। इस इच्छा या मनौती को मां काली अवश्य पूर्ण करती हैं। यह ताले श्रद्धालुओं ने अपनी मनौती के लिए लगाये हैं। बताते हैं कि वर्षों से यह मान्यता-परम्परा अनवरत चली आ रही है। मनौती के ताला लाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मंदिर परिसर के बाहर पूजन-अर्चन की सामग्री बेचने वाले दुकानदारों के पास ताला उपलब्ध हो जाता है। बताते हैं कि बंगाली मोहाल के इस मंदिर की स्थापना एक बंगाली परिवार ने की थी लेकिन अब इस मंदिर की देखरेख-देखभाल द्विवेदी परिवार करता है।

          बंगाली मोहाल में आज भी बड़ी संख्या में बंगाली परिवार रहते हैं। मां काली जी का नित्य निर्धारित परम्परा के अनुसार पूजन-अर्चन किया जाता है। परिधान पहनाने से लेकर श्रंगार तक सभी आवश्यक पूजन व्यवस्थायें व आरती सभी कुछ समय से सुनिश्चित किया जाता है। बंगाली संस्कृति व परम्पराओं का पालन किया जाता है। नवरात्र में सप्तमी, अष्टमी व नवमी को मां काली जी का विशेष पूजन अर्चन  होता है। दीपावली पर काली जी की महापूजा आयोजित होती है। बंगाली परिवारों के अलावा अन्य हिन्दू परिवार मां काली के इस दिव्य-भव्य स्थल पर बच्चों के मुण्डन संस्कार एवं कर्ण छेदन संस्कार सहित अन्य संस्कार भी कराते हैं। विशेष उत्सव पर मां काली के दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं-भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
                          

Sunday, January 1, 2017

'सीसामऊ बाजार" गरीबों का मेगामॉल

  
       'सीसामऊ बाजार" गरीबों का मेगामॉल। जी हां, आैद्योगिक शहर कानपुर का सीसामऊ बाजार गरीबों की हर खास-ओ-आम आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति करता है। 
          चाहे परिधान खरीदने हों या फिर चुल्हा-चौका एवं घर-गृहस्थी का कोई सामान खरीदना हो, सभी कुछ इस बाजार में आसानी से मिलेगा। वह भी काफी किफायती दामों पर उपलब्ध होंगे। करीब तीन से पांच वर्ग किलोमीटर दायरे में फैला सीसामऊ बाजार सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। शहर के जरीब चौकी चौराहा से पी रोड पर बजरिया चौराहा के बीच पड़ने वाला सीसामऊ बाजार खास तौर से महिलाओं के परिधान एवं रेडीमेड गारमेंट्स के लिए जाना जाता है लेकिन उपलब्ध सब कुछ होगा। सीसामऊ बाजार खास तौर से पी रोड के पश्चिमी इलाके को कहा जाता था लेकिन अब बाजार का विस्तार काफी लम्बे-चौड़े एरिया में हो चुका है। 
            सीसामऊ बाजार पूर्व में पी रोड व इसके आगे तक का इलाका है तो पश्चिम में जवाहर नगर, उत्तर में लेनिन पार्क व दक्षिण में राम बाग इलाका तक फैला है। महिलाओं के साज-ओ-श्रंगार का हर सामान सीसामऊ बाजार में उपलब्ध है तो वहीं सीसामऊ बाजार में आभूषण का एक अलग बाजार-मार्केट है। महिलाओं के साज-ओ-श्रंगार का हर आभूषण उपलब्ध होता है। खासियत यह कि गरीब परिवार भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति इस आभूषण बाजार से कर सकते हैं। करीब डेढ़ दशक पहले यह बाजार लाटरी के लिए विख्यात ंहो गया था। लाटरी गुरु 'शर्मा जी" की ख्याति भी सीसामऊ बाजार से जुडी़ तो वहीं जवाहर नगर ढ़लान पर शूज, जूता-चप्पल-सैंडिल का बाजार विकसित हो गया। दलहन से लेकर हरी ताजी सब्जियां भी उपलब्ध कराता है यह बाजार।
             इस बाजार के पी रोड कार्नर पर कभी 'गोपाल टाकीज" हुआ करती थी लेकिन अब गोपाल टाकीज ने रेडीमेड मार्केट की शक्ल अख्तियार कर ली है। इस तरह से देखा जाये तो चौतरफा सीसामऊ बाजार का विस्तार हुआ। सीसामऊ बाजार जहां एक ओर उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति करता है तो वहीं बड़ी तादाद में गरीबों को रोजी-रोजगार के अवसर उपलब्ध कराता है। सैकड़ों ठेला-ठेलिया वाले इस बाजार से रोजी-रोटी कमाते हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि सीसामऊ बाजार के कारोबार का टर्नओवर एक अरब से अधिक हो। छोटे-बड़े दुकानदार-कारोबारियों को ही लें तो इनकी संख्यां भी पांच हजार से कम न होगी। कोई फुटपाथ पर दुकान लगा कर उपभोक्ताओं को उत्पाद की बिक्री करता है तो कोई आलीशान शोरुम से उपभोक्ताओं को लुभाता है।
         काफी लम्बे-चौड़े एरिया में सजने वाला यह बाजार उपभोक्ताओं-खरीददारों से हमेशा गुलजार रहता है। बच्चों को खिलौना दिलाना हो या बड़ों को सूट सिलवाना हो, कंहीं आैर जाने की जरुरत नहीं। सीसामऊ बाजार हर आवश्यकता की पूर्ति करेगा। सीसामऊ बाजार ने भी कई इतिहास रचे तो कई इतिहास देखे। कुछ भी हो सुई से लेकर सोने का हार तक सब कुछ उपभोक्ताओं को मुहैया कराने वाला यह बाजार देश-विदेश में भी जाना जाता है। 

Friday, December 30, 2016

हिन्दुस्तानियों की होली के सामने झुकी ब्रिटानिया हुकूमत 


      होली के इन्द्रधनुषी रंगों के सामने भी ब्रिटानिया हुकूमत को झुकना पड़ा था। जी हां, ब्रिाटानिया हुकूमत को हिन्दुस्तानियों की होली के सामने न केवल झुकना पड़ा बल्कि देश में एक नायाब परम्परा भी पड़ गयी।

       होली के देश भर में अजब-गजब रंग-ढंग दिखते हैं लेकिन कनपुरिया होली के अंंदाज ही निराले हैं। उत्तर प्रदेश के कानपुर में आैसतन एक सप्ताह तक होली का हुडदंग चलता है। रंग अबीर के छीटों-बौछारों से आठ दिनों तक शहर सराबोर रहता है। अनुराधा नक्षत्र  तक होरिहारों की मस्ती घर-गली, गलियारों से लेकर सड़कों तक दिखती है। उत्तर प्रदेश का कानपुर एक जमाने में एशिया का मैनचेस्टर का खिताब रखता था। आैद्योगिक कल-कारखानों से लेकर लघु उद्योगों से कानपुर आबाद था। मेहनतकश मजदूरों के लिए कानपुर जाना जाता था। देश के कोने-कोने, गांव-गलियारों के मजदूर यहां रोजी रोटी कमाते थे। खास तौर उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल यहीं बसता था। कानपुर का हटिया, नौघड़ा, लाठी मोहाल, राम गंज, शकरपट्टी, दाल मण्डी, नयागंज, जनरलगंज, सिरकी मोहाल व घुमनी मोहाल आदि सहित शहर के घनी आबादी वाले इलाकों में गरीबों व मजदूरों का आशियाना होता था।      

            मेहनतकश मजदूर दो तीन दिन होली का हुड़दंग करते थे। रंगों से सराबोर रहते थे। यह बात 1942 की है।  अंग्रेज हुक्मरानों को यह सब नागवार गुजरता था। एक  अंग्रेज अफसर ने एक दिन से अधिक होली खेलने पर रोक लगा दी। हुआ यह कि होरिहारे होली खेल रहे थे। उसी दौरान एक घुडसवार अंग्रेज अफसर गुजरा। होली का रंग उस अंग्रेज के उपर पड़ गया।  अंग्रेज अफसर गुस्से खूब लाल पीला हुआ। अंग्रेज अफसर ने एक दिन से अधिक होली खेलने पर रोक लगा दी। अंग्रेज कलक्टर ने इतना सख्त फरमान जारी कि एक दिन से अधिक जो भी होली खेलेगा, उसे गिरफ्तार कर लिया जायेगा। बस इस सांस्कृतिक गुलामी के खिलाफ शहर के बाशिंदों की फौज व मजदूर सड़कों पर उतर आये। कनपुरिया तेवर तीखे हो चले। शहर के बाशिंदों ने एक स्वर में आवाज बुलंद की कि अब एक दो दिन नहीं बल्कि एक सप्ताह होली खेलेंगे।

          इस एलान के साथ ही हटिया के रज्जन बाबू पार्क में इलाके के बाशिंदों ने तिरंगा झण्डा फहरा दिया। बस क्या था, अंग्रेज हुक्मरान बगावत करने वाले हिन्दुस्तानियों की खोजबीन में छापामारी करने लगे। तिरंगा फहराने वालों में लाला बुद्धू लाल, गुलाब चन्द सेठ, मूलचन्द सेठ, अमरीक सिंह, इकबाल कृष्ण कपूर, शिवनारायण, जागेश्वर त्रिवेदी, विश्वनाथ मेहरोत्रा, हरिमल मेहरोत्रा, रघुवर दयाल भट्ट, किशन शर्मा, कन्हैया लाल गुप्ता व पीताम्बर लाल आदि थे। इस एलान से शहर के बाशिंदे खास तौर से मजदूर खुशी से झूम उठे क्योंकि एक दो दिन के बजाय एक सप्ताह होली खेलने का मौका मिला। अंग्रेजी हुकूमत ने आदेश की अवज्ञा में लाला बुद्धू लाल, गुलाब चन्द सेठ सहित 43 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। विरोध में शहर के लोग सड़कों पर उतर आये। चारों ओर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ नारेबाजी होने लगी।

         आंदोलन के उग्र तेवर देख अंग्रेज हुक्मरानों की नींद हराम हो गयी। इस आंदोलन में हिन्दू, मुस्लिम सिख सभी शामिल थे। आंदोलन को देख कर अन्तोगत्वा अंग्रेज हुक्मरानों को झुकना पड़ा। सभी गिरफ्तार रिहा कर दिये गये। जिस दिन रिहाई की गयी, उस दिन अनुराधा नक्षत्र था। ज्योतिष के अनुसार अनुराधा नक्षत्र प्रतिष्ठान व दुकान, कारोबार खोलने के लिए शुभ माना जाता है। आंदोलनकारियों की रिहाई होने के बाद उसी दिन अनुराधा नक्षत्र में दुकानों को खोला गया। होली का रंग खेला गया। हटिया के रज्जन बाबू पार्क से होरिहारों का मेला निकला। एक भैंसा ठेला पर एक पुतला रख कर मेला निकाला गया। रंग खेलते होरिहारों की फौज शहर के विभिन्न सड़कों से होते हुये सरसैया घाट पहंुचे। गंगा में नहा धोकर रंग साफ किया। शाम को उसी स्थान सरसैया घाट पर मेला लगा। होली गंगा मेला की परम्परा आज भी कायम है।

        धीरे-धीरेे होली गंगा मेला का स्वरूप बढ़ता गया। होली के बाद सरसैया घाट पर शाम को भव्य दिव्य मेला लगता है। एक किलोमीटर से अधिक दायरे में लगने वाला होली गंगा मेला एक  भव्य सांस्कृतिक आयाम की शक्ल में दिखता है। होली गंगा मेला में सैकड़ों की तादाद में पाण्डाल लगते हैं। इनमें पुलिस प्रशासन, जिला प्रशासन, नगर निगम, बैंक, राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, सांस्कृतिक संस्थाओं सहित अनेकानेक प्रकार के पाण्डाल लगते हैं। ठंडई से लेकर पान, लौंग, इलाइची व सौंफ सहित बहुत कुछ इन पाण्डालों में सेवाभाव व  मिलनचार में उपलब्ध रहता है। शहर की राजनीतिक हस्तियां भले देश की शीर्ष सत्ता में हों लेकिन होली गंगा मेला में आना नहीं भूलते। दोपहर से प्रारम्भ होकर होली गंगा मेला देर रात तक चलता रहता है। होली से लेकर अनुराधा नक्षत्र तक शहर रंगों से सराबोर रहता है। हटिया होली गंगा मेला के संयोजक ज्ञानेन्द्र विश्नोई ज्ञानू कहते हैं कि कानपुर का होली गंगा मेला एक परम्परा के साथ ही सांस्कृतिक गुलामी के खिलाफ एक जंग की याद भी है। अब तो होली गंगा मेला एक सांस्कृतिक धरोहर की भांति है। 

                           

'मैजिक" सांइस एण्ड टेक्नालाजी

          बंगाल का 'काला जादू" भले ही मन-मस्तिष्क में कोई संशय पैदा करता हो लेकिन जादू (मैजिक) विज्ञान, तकनीकि व कला एक ऐसा समिश्रण है, जो आपके मन-मस्तिष्क को प्रफुल्लित-रोमांचित कर देता है। विशेषज्ञों की मानें तो जादू सिर्फ आैर सिर्फ एक चातुर्य कला है। इसमें विज्ञान, कला, तकनीकि सहित असंख्य महत्वपूर्ण विधाओं-आयामों का संगमन है क्योंकि खाली हाथ से भभूत (राख) आदि का निकलना कोई चमत्कार नहीं बल्कि वैज्ञानिक प्रयोग हैं।

       विज्ञान एवं तकनीकि के विकास एवं प्रयोगों से ही जादू के नवीनतम आयामों का विस्तार होता है। देश-दुनिया में जादुई करिश्मों की एक लम्बी श्रंखला देखने-सुनने को मिलती है। बात चाहे जहांगीर नामा की हो या फिर मैजिक बुक की हो.... जादुई करिश्मों का कहीं कोई अंत नहीं दिखता। जादू के हिन्दुस्तानी साधकों ने जादू को एक सकारात्मक रंग दिया जिससे समाज में 'हम सुधरेंगे राष्ट्र सुधरेगा...." की रीति-नीति के चिंतन को बल मिलता दिखा। छुटभइये जादूगरों की बात छोड़ दें तो नामचीन जादूगर अपने जादुई करिश्मों से कहीं न कहीं कोई संदेश अवश्य देते हैं जिससे आप सोचने या चिंतन के लिए विवश हो जायेंगे। छुटभइये जादूगरों की बात इस लिए भी छोड़ देनी चाहिए क्योंकि दो वक्त की रोजी-रोटी का जोड़ जुगाड़ उनको इतना वक्त नहीं देता कि वह कुछ नया कर सकें।                जादू की खास दुनिया में देखें तो गोगिया पाशा का नाम सबसे पहले उभर कर सामने आता है क्योंकि गोगिया पाशा ने जादू को एक नया आयाम दिया आैर हिन्दुस्तानी जादू को विदेशों तक ले गये। जादूगर पी सी सरकार जादू को गांव-गली-गलियारों से निकाल कर मंच (स्टेज) तक ले गये। जादूगर के. लाल ने जादू में ग्लैमर के रंग भरे। जिससे जादू आम से लेकर खास लोगों तक पहंुच गया। देश की आजादी के बाद 'मैजिक बुक" में एक नया आयाम जादूगर ओ.पी. शर्मा के नाम से जुड़ा। जादूगर ओ. पी. शर्मा ने चार दशक के जादुई सफर में एक हजार से अधिक आइटमस की श्रंखला पेश की। देश-विदेश में जादूगर ओ. पी. शर्मा ने आम आदमी के दुख दर्द से लेकर सामाजिक व्यवस्थाओं-कुरीतियों की व्यथा-कथा बयां करने से लेकर उन पर तीखे व्यंग्य बाण भी छोड़े। 

जादूगर ओ. पी. शर्मा अपने जादुई पिटारे को लेकर मारीशस, दुबई, इंग्लैण्ड, जापान, अमेरिका व नेपाल सहित कई देशों में जा चुके हैं। विदेशों में उनके एक हजार से अधिक शो हो चुके हैं। विशेषज्ञों की मानें तो जादूगर पी सी सरकार ने जादू के 23000 शो करने का एक रिकार्ड बनाया था लेकिन जादूगर ओ पी शर्मा इस रिकार्ड से कहीं आगे निकल चुके हैं। जादूगर ओ. पी. शर्मा   देश विदेश में अब तक करीब 35000 शो कर चुके हैं। इसमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, चण्डीगढ़, बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, आसाम, नागालैण्ड, उत्तराचंल, गुजरात, महराष्ट्र, गोवा, आन्ध्र प्रदेश, केरल व तमिलनाडु सहित देश के तमाम राज्यों में उनके जादुई शो हो चुके हैं। विशेषज्ञों की मानें तो जादूगरों की राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका हैं क्योंकि जादुई करिश्मों से वह संदेश देने की कोशिश करते हैं। 

         जादूगर ओ. पी. शर्मा के जादुई पिटारे में कन्या भ्रूण हत्या, अशिक्षा, अंधविश्वास, दहेज उत्पीड़न, भ्रष्टाचार, प्रकृति रक्षा, परिवार नियोजन, नशाखोरी, लालच, एड्स आदि को रेखांकित करने वाली सामाजिक कुरीतियां शामिल हैं। कन्या भ्रुण हत्या में जादूगर दिखाते हैं कि किस प्रकार गर्भ में बालिकाओं की हत्या की जा रही है। दहेज उत्पीड़न को देखते हुए कोई नहीं चाहता कि उसके घर बालिका जन्मे। परिणाम देश में बालक-बालिका के जन्म का अनुपात या संतुलन बिगड़ रहा है। जादू का यह रंग कहीं न कहीं समाज को चिंतन के लिए विवश करता है। जादू के पिटारा से भ्रष्टाचार का राक्षस निकलता है। भ्रष्टाचार के राक्षस को राजनीति पालसी पोसती है लेकिन जब राष्ट्र जागृत होता है तो सभी का पतन हो जाता है। 

       सांइस एण्ड टेक्नालाजी का ही कमाल है कि स्क्रीन से निकल कर कलाकार बाहर शो में आ जाता है। नामचीन जादूगर ओ.पी. शर्मा कहते हैं कि जादू को शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। जिस प्रकार दादी-नानी की कहानियां बच्चों को सकारात्मक संदेश देती हैं, उसी तरह से जादू से बच्चों को संस्कार व राष्ट्र निर्माण का संदेश दिया जाना चाहिए क्योंकि बच्चे ही कल का भविष्य हैं। जादूगर ओ. पी. शर्मा व उनके बेटे सत्य प्रकाश शर्मा (जूनियर ओ. पी. शर्मा ) सयंुक्त रूप से जादुई शो दिखाते हैं। जादूगर ओ. पी. शर्मा की मानें तो जादू कोई करिश्मा नहीं बल्कि साइंस एण्ड टेक्नॉलाजी एवं कला का एक ऐसा समिश्रण है जिससे दर्शक रोमांचित हो जाते हैं। चिता में बैठ कर खुद को जला लेना, रेलवे लाइन में खुद को बांध लेना आैर ट्रेन का उपर से गुजर जाना, आरा से युवक-युवती को काट देना, हवा में गायब कर देना, .... आदि आदि सब सांइस एण्ड टेक्नालाजी की उपलब्धियां हैं।

          विशेषज्ञों की मानें तो आंख से देखने की स्पीड से कहीं अधिक तेज स्पीड में जादूगर को अपना काम करना होता है। एक तरह से कहा जाये कि जादू चातुर्य कला है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। हालांकि जादू शो का संचालन एक इण्डस्ट्री की तरह खर्चीला है क्योंकि शो के उपकरण जुटाना आर्थिक संसाधन के बिना आसान नहीं है। हालांकि इस इण्डस्ट्री में जादू के शौकिया लोग कम ही आना चाहते है क्योंकि इसमें रिटर्न भी इतना आसान नहीं है। जादूगर ओ. पी. शर्मा की मानें तो जादू का शो संचालित करने के लिए एक उद्योग की तरह काम करना होता है। जादूगर ओ. पी. शर्मा के जादुई शो में दस इंजीनियर्स की भूमिका रहती है। उनकी इस टीम में दस इंजीनियर्स के अलावा चार्टेड एकाउण्टेण्ट, वकील, मैनेजर, कम्प्यूटर इंजीनियर, टेक्नीशियन सहित करीब दौ सौ लोगों की लम्बी चौड़ी फौज होती है। सभी की अपनी जिम्मेदारियांं होती हैं। बताते हैं कि इनमें से 70 से 75 सहयोगियों की भूमिका मंच पर होती है जबकि अन्य सहयोगियों की भूमिका मंच से परे होती है।   

        विशेषज्ञों की मानें तो जादू में पशु-पक्षियों की भूमिका का विशेष ख्याल रखा जाता है क्योंकि पशु-पक्षी भी कहीं न कहीं मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालते हैं। पशु-पक्षियों को जादू में भूमिका को ध्यान में रख कर विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। संगीत की स्वरलहरियों को सुन कर पशु-पक्षी अपनी भूमिका को समझ लेते हैं। इसी के साथ ही वह अपनी सक्रियता को जारी रखते हैं। जूनियर ओ.पी. शर्मा (सत्य प्रकाश शर्मा ) की मानें तो शिक्षाप्रद जादुई चमत्कारों से समाज में सकारात्मक सोच का बदलाव लाया जा सकता है। जादू हंसी-ठहाका, रोमांच, रहस्य, चिंतन-मनन व संदेश आदि सभी कुछ देता है। जहांगीर नामा में इण्डियन रोप ट्रिक का उल्लेख मिलता है। जिसमें जादूगर रस्सी पर चढ़ कर गायब हो जाता है लेकिन आज सांइस एण्ड टेक्नालाजी इससे कहीं आगे निकल चुका है। साइंस एण्ड टेक्नालाजी का उपयोग जादू में संदेशपरक होने से समाज में कुछ-न-कुछ कहीं न कहीं बदलाव अवश्य आयेगा। 

                          

Friday, December 23, 2016

सिद्धेश्वर मंदिर : हर मनोकामना पूर्ण

  
       स्वाधीनता आंदोलन की बात हो या धर्म-आध्यात्म का प्रसंग हो, कानपुर का अपना एक अलग ही अंदाज रहा। कानपुुर को छोटी काशी कहा जाये या क्रांतिकारियों की रणभूमि कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।

         गंगा तट पर बसे आैद्योगिक शहर कानपुर का कोई सानी नहीं दिखता। शहर के पूर्वी इलाका जाजमऊ शिव स्थान के तौर पर अपनी पहचान रखता है। जाजमऊ का शिव स्थान 'सिद्धेश्वर मंदिर" से ख्याति प्राप्त है। इसे कानपुर का 'स्वर्ण मंदिर" कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी क्योंकि चाहे शिखर के कलश हों या शिवलिंग या फिर अरघा, सभी रजत से लेकर स्वर्ण जड़ित है। कोई यह नहीं बता सकता कि इस स्वर्ण मंदिर में कितनी तादाद में स्वर्ण एवं रजत का उपयोग किया गया है लेकिन इतना अवश्य है कि स्वर्ण एवं रजत आभा का अपना एक अलग ही आलोक है। 

              किवदंती है कि भगवान शिव यहां स्वयं विराजमान हैं। पुरातनकाल में जाजमऊ में राजा जयाद का राज्य था। राजा जयाद धार्मिक पृवत्ति के थे लिहाजा सिद्धनाथ दरबार की स्थापना उनके शासनकाल में ही हुयी। किवदंती है कि राजा जयाद भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। राजा जयाद ने शिव की घोर उपासना-तपस्या की जिस पर भगवान शिव प्रसन्न हुये आैर प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। राजा जयाद अतिप्रसन्न थे। राजा ने वरदान मांगा कि आप जाजमऊ में ही बस जाइए। भगवान शिव ने कहा कि सौ यज्ञ पूर्ण करो। इच्छा की पूर्ति होगी। राजा ने 99 यज्ञ पूर्ण कर लिये लेकिन 100 यज्ञ में इन्द्रदेव ने विघ्न डाल दिया जिससे सौ यज्ञ पूर्ण नहीं हो सके। समयकाल गुजरने के साथ ही स्थितियां भी बदलती गयीं। राजा जयाद गौशाला की एक ही गाय के दुग्ध का सेवन करते थे। खास बात यह थी कि इस गाय के पांच थन थे। यह गाय जाजमऊ टीला पर दुग्धदान करती थी। गुप्तचरों से जानकारी मिली तो राजा को कौतुहल हुआ। 
      

          दुग्धदान वाले स्थल की खोदाई करायी गयी तो उसमें भगवान शिव का शिवलिंग प्राक्ट्य हुआ। उसी स्थान पर सिद्धेश्वर मंदिर है। शिवलिंग के प्राक्ट्य के बाद राजा जयाद ने शिव मंदिर का निर्माण कराया। कहावत है कि भगवान शिव स्वयं यहां विराजमान हैं। जाजमऊ हिन्दू-मुस्लिम मिली जुली आबादी वाला क्षेत्र है। मुस्लिम आबादी करीब अस्सी प्रतिशत है जबकि हिन्दू आबादी करीब बीस प्रतिशत है। इस इलाके में कभी भी साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुये। यह स्थान क्रांतिकारियों का रणनीतिक स्थल भी रहा। क्रांतिकारियों की रणनीति इस स्थान पर भी बनती रही। श्रावण मास में सिद्धेश्वर के दर्शन-पूजन-अर्चन के लिए बड़ी संख्या श्रद्धालु आते हैं। मान्यता है कि श्रद्धालुओं को यहां इक्षित वरदान की प्राप्ति होती है।     


Thursday, December 22, 2016

जरीब चौकी : आैद्योगिक हलचल तो रिहायश भी 

  
       उत्तर प्रदेश की आैद्योगिक राजधानी कानपुर का कोना-कोना अपनी अलग एवं खास पहचान रखता है। चाहे वह मंदिर श्रंखला के तौर पर हो या कारोबारी इलाके शक्ल में हो। 

खास बात यह दिल्ली हावड़ा के मुख्य मार्ग पर परिवहन की व्यवस्थायें भले ही कमजोर हों लेकिन एक शहर से दूसरे शहर को जोड़ने के संसाधन-आधारभूत ढ़ाचा में कहीं कोई कमी नहीं। इस शहर के मध्य से ग्रांड ट्रंक रोड (जी. टी. रोड) गुजरता है तो वहीं कालपी रोड भी यहां से होकर निकलता है। शहर में इन दोनों मुख्य मार्गों का संगम स्थल भी है। इस स्थान को जरीब चौकी चौराहा के तौर पर जाना जाता है। जरीब चौकी चौराहा पर जी टी रोड व कालपी रोड़ एक दूसरे को क्रास करते हैं। जरीब चौकी शहर का खास इलाका माना-पहचाना जाता है। जरीब चौकी खास तौर से एक अतिमिश्रित इलाका है। इस क्षेत्र में गरीब के झोपडे़ हैं तो वहीं शहर के धनाढ्य वर्ग रिहायश भी है। सस्ते एवं अच्छे भोजनालय हैं तो वहीं कारोबार क्षेत्र भी है। 

            आैद्योगिक क्षेत्र भी यहां खास है। जरीब चौकी का नाम भले ही चौकी अर्थात चौक या फिर चौराहा हो, वस्तुत इस स्थान से शहर के विभिन्न इलाकों को जोड़ने वाले पांच मुख्य मार्ग निकलते हैं। जरीब चौकी से पूर्व दिशा की ओर जाने वाला जी. टी. रोड फतेहपुर, इलाहाबाद होते हुये हावड़ा को चला जाता है। इस मुख्य मार्ग पर आैद्योगिक इकाइयों के साथ ही अब आलीशान शोरुम्स शोभा बढ़ा रहे हैं। कभी इस इलाके में सिंह इंजीनियरिंग्स सहित कई नामचीन इकाईयां आबाद थीं। इसके ठीक बगल से पूर्व दिशा में कालपी रोड गुजरती है। यह सड़क सीधे कानपुर सेंट्रल  रेलवे स्टेशन (घंटाघर) से जोड़ती है। बॉलीवुड के मजे लेने हों तो संगीत सिनेमा हाल है तो वहीं खान-पान के लईया-पट्टी-गजक सहित बहुत कुछ मिलेगा। अलमारी की खरीद करनी हो या सोफा लेना हो, बहुत बड़ा मार्केट मिलेगा। 

             इसके उत्तर दिशा में पी. रोड है। पी. रोड सीसामऊ बाजार, गांधी नगर एवं रामबाग सहित कई इलाकों को जोड़ता है। सीसामऊ बाजार सस्ता व गुणवत्तापरक कपड़ा के लिए खास तौर से विख्र्यात है। यह रिहायशी व व्यापारिक मिला-जुला इलाका है। पश्चिम दिशा की ओर जाने वाला मुख्य मार्ग जी. टी रोड है। यह मुख्य मार्ग गुमटी नम्बर पांच से रावतपुर होते हुये कल्याणपुर आदि इलाकों को जोड़ता है। इस सड़क पर टिम्बर के कारखाने हैं तो वहीं मोटर पार्टस सहित टायर-ट्यूब की बड़ी दुकाने हैं।

गुमटी गुरुद्वारा भी इसी सड़क पर है। ह्मदय रोग संस्थान सहित कई चिकित्सा संस्थान भी इसी मार्ग पर हैं। जरीब चौकी से पश्चिम की ओर जाने वाले कालपी रोड पर शहर का एक बड़ा आैद्यंोगिक आस्थान है। कालपी रोड आैद्योगिक आस्थान में आैद्योगिक क्रियाकलाप के अलावा कल-कारखानों के साथ साथ ट्रक-मोटर्स के सुधार-मरम्मत का कार्य भी होता है। जरीब चौकी चौराहा पर एक छोटा किन्तु सुन्दर पार्क है। इसकी देखरेख नगर निगम के अधीनस्थ है। इस पार्क में महाराणा प्रताप की घोडे पर सवार प्रतिमा स्थापित है। यह शहर का अतिव्यस्तम एवं भीड़भाड़ वाला इलाका है।  

Wednesday, December 21, 2016

पेशवा की विरासत : बनखण्डेश्वर महादेव मंदिर

  
       आस्था, विश्वास एंव श्रद्धा के स्थल भी स्वाधीनता आंदोलन में क्रांतिकारियों के केन्द्र बने थे। सामान्यत: धर्म स्थल या पूजा-पाठ के स्थल पूजन-अर्चन तक ही सीमित रहते हैं लेकिन ऐसा नहीं। बिठूर स्थित भगवान शिव का मंदिर बनखण्डेश्वर महादेव का मंदिर आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा के साथ साथ क्रांतिकारियों का केन्द्र भी था। बिठूर स्थित बनखण्डेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना भी क्रांतिकारियों ने की थी। श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास के इस केन्द्र को पेशवा की विरासत कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। किवदंतियों की मानें तो बाजीराव पेशवा एक बार बिठूर आ रहे थे। मंधना के पास जंगल में रात हो गयी तो पेशवा ने जंगल में ही डेरा डाल दिया। सुबह पेशवा की नींद खुली तो देखा टीले पर एक गाय खड़ी है। 

गाय टीले पर दुग्धदान कर रही है। टीला बेल के पत्तों से ढ़का था। बाजीराव पेशवा को यह सब देख कर आश्चर्य हुआ। पेशवा ने टीला स्थल को कौतुहलवश खोदवाया तो शिवलिंग का प्राक्ट्य हुआ। विधि-विधान से शिवलिंग की स्थापना की गयी। बाजीराव पेशवा ने लक्ष्मीबाई का कर्णछेदन भी इसी स्थान पर कराया था। हर्ष-खुशी में बाजीराव पेशवा ने जयपुर से अन्य शिवलिंग मंगा कर उसी स्थान पर स्थापित कराया था। चूंकि यह वन क्षेत्र था लिहाजा ग्रामीणों के बीच 'बनखण्डेश्वर महादेव" की ख्याति हुयी। अब इस धर्म स्थल को बनखण्डेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।

 उसी काल से इस स्थल पर दो शिवलिंग स्थापित हैं। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पेशवा की लड़ाई की रणनीति भी इसी स्थल पर बनती थी। बाजीराव पेशवा ने तात्याटोपे के साथ मिल कर इसी स्थान पर मैस्कर घाट पर हमले की रणनीति बनायी थी। बताते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हमला बोलने से पहले पेशवा बनखण्डेश्वर महादेव के दर्शन करने अवश्य जाते थे। मंदिर में माथा टेकने के बाद ही लड़ाई-सघर्ष के लिए आगे बढ़ते थे। यही वह स्थान है, जहां बाजीराव पेशवा ने तात्याटोपे को अपना सिपहसलार बनाया था। भेंट स्वरुप तात्या को टोपी दी थी। इसी के बाद तात्या का नाम टोपे पड़ गया। स्वाधीनता आंदोलन की अधिसंख्य रणनीति इसी स्थान पर बनती थी। आस्था है कि बेल पत्र पर अपनी मनौती लिख कर बनखण्डेश्वर महादेव को अर्पित करने से इच्छित मनोकामना की पूर्ति होती है। शहर से करीब बीस किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर की मान्यता यह भी है कि श्रावण मास में एक सौ एक बेल पत्र बनखण्डेश्वर महादेव को अर्पित करने से मनोकामना पूर्ण होती है। 

ब्रिटिश हुकूमत व स्वाधीनता आंदोलन की जंग में ब्रिाटिश हुकूमत को सतना में पेशवा का खजाना नहीं मिला तो ब्रिटिश हुकूमत खिसिया गयी। ब्रिाटिश हुकूमत को पता चला कि पेशवा ने अपना खजाना बिठूर-मंधना स्थित मंदिर में छिपा रखा है। खजाना हासिल करने के लिए ब्रिाटिश हुकूमत ने मंदिर में हमला बोल दिया लेकिन ब्रिाटिश सैनिकों को उल्टे पांव भागना पड़ा क्योंकि सांप-बिच्छू एवं मधुमक्खियों ने सैनिकों पर हमला बोल दिया था। बताते हैं कि भगवान शिव के इस स्वरुप अर्थात बनखण्डेश्वर महादेव मंदिर की रक्षा-सुरक्षा आज भी सांप-बिच्छू व मधुमक्खियां करते हैं। खास बात यह है कि बनखण्डेश्वर महादेव की तीन प्रहर पूजन-अर्चन किया जाता है। खास तौर से श्रावण मास में भव्यता अलग ही रहती है। बाजीराव पेशवा ने बनखण्डेश्वर महादेव के पूजन-अर्चन के लिए बिठूर के एक ब्रााह्मण को रखा था। उसी परिवार का ब्रााह्मण अभी पूजन-अर्चन करता-कराता है। श्रावण मास में इसी क्षेत्र में भव्य-दिव्य मेला लगता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु-भक्त दर्शन-पूजन एवं मनौती के लिए आते हैं।