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Friday, December 16, 2016

मां बुद्धादेवी मंदिर :
भोग में सिर्फ हरी सब्जियां
  
       कानपुर को आैद्यागिक राजधानी के साथ ही मंदिरों का शहर कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। मंदिर श्रंखला प्राचीनकाल की। शहर के ह्मदयस्थल खोया बाजार-मेस्टन रोड इलाके में मां भगवती बुद्धादेवी का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर की भी अपनी मान्यताएं एवं परम्पराएं हैं। शहर के खोया बाजार-हटिया बाजार के मध्य स्थित इस मंदिर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ अनवरत बनी रहती है। खास तौर से नवरात्र के दिनों में तो श्रद्धालुओं की अपार भीड़ होना लाजिमी हो जाता है। श्रद्धालुओं के हाथों में फूूल-प्रसाद की डलिया व मां भगवती के जयघोष से अनुगूंजित नारों से परिवेश। खास बात यह है कि मां भगवती बुद्धा देवी को प्रसाद में ताजी एवं हरी सब्जियां ही भेंट की जाती है। सब्जियों में मसलन लौकी, बैंगन, पालक, टमाटर, गाजर, मूली, तरोई, हरी मटर, सीताफल, टीण्डा, भिण्डी एवं आलू आदि मां को प्रसाद में भेंट किये जाते है। मां भगवती के इस स्वरुप को मां बुद्धादेवी के नाम से ख्याति मिली। गौरतलब है कि इस मंदिर में न तो कोई पुजारी है आैर न कोई पुरोहित। 


माली ही मंदिर की व्यवस्था संभालते हैं। मंदिर सौ वर्ष से अधिक पुराना है। प्राचीनकाल में इस स्थान पर फूल-पौधों से आच्छादित बागीचा था। इस बागीचा की देखरेख माली परिवार करता था। माली परिवार के मुखिया को रात स्वप्न में मां भगवती ने दर्शन दिये। स्वप्न एवं दर्शन का सिलसिला अनवरत चलता रहा। अन्तोगत्वा, माली ने बागीचा में खोदाई करायी तो खोदाई में मां भगवती के इस स्वरुप का प्राक्ट्य हुआ। खोदाई दिन तक अनवरत चली। मां भगवती के इस स्वरुप बुद्धादेवी की स्थापना के लिए चबूतरा बना। चबूतरा पर मां बुद्धादेवी की स्थापना की गयी। चूंकि मां बुद्धादेवी का प्राक्ट्य बागीचा से हुआ लिहाजा भक्त-श्रद्धालु प्रसाद में ताजी एवं हरी सब्जियां चढ़ाने लगे। धीरे-धीरे प्रसाद में हरी एवं ताजी सब्जी चढ़ाने की परम्परा बन गयी। शनै: शनै: चबूतरा ने भी मंदिर का स्वरुप ले लिया। मान्यता है कि मां बुद्धादेवी अपने भक्तों की हर मुराद पूरी करती है।   


Thursday, December 15, 2016


मूलगंज : बाबू जी क्या क्या खरीदोगे !
सुबह 'दिहाड़ी मजदूर मण्डी" दिन भर बाजार आबाद  
            कानपुर शहर का 'मूलगंज" ! जी हां, यह इलाका मूलगंज अपने खास अंदाज के लिए शहर क्या आसपास के इलाकों में खासा पहचाना जाता है। 'मूलगंज" का नाम आते ही किसी के चेहरे पर मुस्कान नाच उठती है तो वहीं खास-ओ-आम के बाजार का अक्स उभरता है।

              'मूूलगंज" अपने आप में एक समग्र बाजार। दिहाड़ी मजदूर चाहिए या र्इंजन चाहिए या फिर कपड़े-लत्ते नये-पुराने कुछ भी या फिर जिस्म की भूख मिटानी हो। हर जरुरत पूरी करे सिर्फ 'मूलगंज"। हालांकि 'मूलगंज" की चारों दिशाओं में अलग-अलग मुख्य मार्ग-अलग-अलग मुख्य मार्केट। फिर भी समग्रता में चौतरफा इलाका मूलगंज ही माना जाता है। 'मूलगंज" चौराहा से पूूरब की ओर मेस्टन रोड, पश्चिम में लाटूश रोड, उत्तर में नई सड़क आैर दक्षिण में हालसी रोड का इलाका आता है।

'मूलगंज" चौराहा पर सुबह 'दिहाडी मजदूर मण्डी" आबाद होती है तो वहीं दिन भर से रात तक व्यापारिक चहल-पहल रहती है। 'दिहाड़ी मजदूर मण्डी" में शायद ही कोई ऐसा किस्म हो जिसका मजदूर न मिले। मूलगंज चौराहा-चौक ने भी शहर का इतिहास देखा। स्वाधीनता आंदोलन में क्रांतिकारियों के तेवर देखे तो वहीं देश में लोकसभा से लेकर राष्ट्रपति तक चुनाव लड़ने वाले भगवती प्रसाद दीक्षित 'घोड़े वाला" की जनसभायें भी देखीं। 'घोड़े वाला" की जनसभाओं में चौक-चौराहा खचाखच भरा रहता था। कहीं पैर रखने की जगह नहीं होती थी।


           अब तो इस इलाके में शहर का सबसे बड़ा जूता-चप्पल मार्केट सज गया।  फिर भी 'बाबूजी" धीरे चलना जरा संभलना बड़े धोखे हैं इस राह में.... जी हां, मूलगंज 'नगर बधुओं" का इलाका भी है। 'नगर बधुओं" से मुलाकात-मुस्कान किसी के चेहरे को खिला देती है तो किसी को बर्बाद भी कर देती है। 'मूलगंज" के इस हसीन बाजार को 'रोटी वाली गली" व 'नील वाली गली" के नाम से जाना जाता है। हालांकि 'नगर बधुओं" को प्रशासन के तेवर देख कर मूलगंज का यह इलाका छोड़ना पड़ा। फिर भी 'नगर बधुओं" की रौनक से इलाका आबाद रहता है। मूलगंज का लाटूश रोड इलाका मशीनरी उद्योग-कारोबार का क्षेत्र है।


            चाहे सिलाई मशीन की खरीद करनी हो या डीजल र्इंजन-पम्प चाहिए। खराद से लेकर छोटे-बड़े मशीनरी पुर्जे भी इस बाजार में उपलब्ध होते हैं। मूलगंज-मेस्टन रोड इलाके के बाजारों के घर गृहस्थी का छोटा से बड़ा हर सामान उपलब्ध रहता है। चाहे बिजली का सामान खरीदना हो या फिर कपड़े-लत्ते की खरीदारी करनी हो। खास यह कि मूलगंज का दिल शहर के लिए धड़कता है तो वहीं शहर का दिल भी मूलगंज के लिए धड़कता है। मूलगंज में देशी घी के स्वादिष्ट व्यंजन उपलब्ध होते हैं तो वहीं खोया बाजार भी स्वाद को बढ़ाता है। मूलगंज के खोया-मावा की ख्याति दूर-दूर तक है। आसपास के व्यापारी इसी बाजार में दुग्ध उत्पाद बेंचने आते हैं। वहीं मूलगंज का नई सड़क इलाका 'दबंगों" के नाम हमेशा से रहा।



  






Wednesday, December 14, 2016

आनन्देश्वर मंदिर 
श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा
दर्शन से क्लेश कटे, द्वैश खत्म
 
       मेगा सिटी कानपुर को 'छोटी काशी" कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 'छोटी काशी" से आशय यह है कि शहर में सौ से अधिक मंदिर श्रंखला विद्यमान है। ब्राह्ममुहूर्त से ही शहर घंटा-घडियाल के घोष-टंकार से अनुगूंजित होने लगता है। शहर का एक ऐसा ही स्थान बाबा आनन्देश्वर मंदिर है। गंगातट परमट पर स्थित बाबा आनन्देश्वर मंदिर में शिव दर्शन के लिए श्रावण मास में भक्तों-श्रद्धालुओं का रेला उमड़ता है। मान्यता है कि बाबा आनन्देश्वर मंदिर में साक्षात शिव दर्शन देते हैं। बाबा आनन्देश्वर मंदिर पुरातनकाल-महाभारतकाल का माना जाता है। किवदंती है कि महाभारतकाल में दानवीर कर्ण भगवान शिव के दर्शन-पूजन-अर्चन के लिए आते थे। इस पूजन-अर्चन के दौरान एक गाय भी आती थी। दानवीर कर्ण के पूजन-अर्चन वाले स्थल पर ही गाय भी दुग्धदान करती थी। राजा कौशल की गायों को परमट गांव चारागाह में चराने चरवाहा आता था। राजा कौशल की गाय आनन्दी दूध नहीं देती थी। जिस पर राजा कौशल ने चरवाहा से नाराजगी व्यक्त की। चरवाहा ने तहकीकात की तो दुग्धदान की हकीकत सामने आयी। चरवाहा ने राजा कौशल को हकीकत से वाकिफ कराया तो राजा कौशल ने उक्त स्थल की खोदाई करायी। जिसमें शिवलिंग प्रकट हुआ।

अनतोगत्वा,  राजा कौशल ने उसी स्थान पर शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठित करा दिया। चूंकि गाय का नाम आनन्दी था लिहाजा, राजा कौशल व बाशिंदों ने शिवमंदिर को बाबा आनन्देश्वर के नाम से ख्याति दी। सोमवार को खास तौर से दर्शनार्थियों की सर्वाधिक भीड़ होती है लेकिन सामान्य दिनों में भी भक्तों-श्रद्धालुओं का दर्शन के लिए तांता लगा रहता है। धर्माचार्यों की मानें तो सोमवार का अंक दो होता है। यह स्थिति चन्द्रमा का प्रतिनिधित्व करती है। चन्द्रमा मन का संकेतक होता है। चन्द्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विद्यमान रहता है। शिव-पार्वती का पूजन अर्चन के साथ ही रुद्राभिषेक भी होता रहता है।

मान्यता है कि बाबा आनन्देश्वर मंदिर में शिव दर्शन करने व सोमवार को व्रत रखने वाले भक्त-श्रद्धालुओं को अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है। भगवान शिव पद, प्रतिष्ठा एवं ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। बाबा आनन्देश्वर के दर्शन-पूजन-अर्चन के लिए शहर के दर्शनार्थियों-भक्तों-श्रद्धालुओं के अलावा आसपास के इलाकों के अलावा दूर-दराज से भी आते हैं। गंगा के परमट घाट के शीर्ष पर स्थापित बाबा आनन्देश्वर का यह मंदिर अपनी विशिष्टताओं के लिए दूरदराज तक जाना जाता है। मान्यता है कि बाबा आनन्देश्वर के दर्शन मात्र से सारे क्लेश समाप्त हो जाते है। मंदिर में श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा स्वत: दिखती है। गंगा स्नान के लिए परमट घाट पर सीढ़ियां हैं। हालांकि गंगधारा अब सीढ़ियों से काफी दूर है जिससे श्रद्धालुओं को गंगा स्नान में असुविधा का सामना करना पड़ता है। धर्माचार्यों की मानें तो बाबा आनन्देश्वर का यह मंदिर दो सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। नित्य करीब दस हजार श्रद्धालु शिवलिंग के दर्शन करते हैं। करीब एक एकड़ क्षेत्रफल में फैले इस मंदिर का संचालन पहले ट्रस्ट के हाथों में था लेकिन अब देखरेख जूना अखाड़ा के सानिध्य में होती है।




Tuesday, December 13, 2016


फूलबाग : अतीत का साक्षी
  
       'एशिया का मैनचेस्टर कानपुर" जी हां, हिन्दुस्तान के सबसे बड़े सूबा उत्तर प्रदेश का शहर कानपुर कभी एशिया के मैनचेस्टर का खिताब रखता था। अब भले ही इस शहर ने यह खिताब खो दिया हो लेकिन गौरव-रौनक में कहीं कोई कमी नहीं। कानपुर शहर का ह्मदयस्थल 'फूलबाग"। फूलबाग का भी अपना एक अलग इतिहास है। ब्रिाटिश हुकूमत ने इस स्थान को फूूलबाग का नाम दिया तो स्वाधीनता के बाद इसका नामकरण 'गणेश शंकर विद्यार्थी उद्यान" कर दिया गया। शहर के व्यापारिक एवं अतिविशिष्ट इलाके में शुमार फूलबाग ने अब तक सैकड़ों बसंत देखे। बसंत यूूं कहा जाएगा क्योंकि इसे फूलबाग यूं ही नहीं कहा गया। गंगा नदी से दक्षिण व शहर के माल रोड किनारे एक बड़ा मैदान, इसे फूलबाग कहा गया। फूलबाग का यह बड़ा मैदान अब धीरे-धीरे कई हिस्सों में विभक्त हो गया। बताते हैं कि स्वाधीनता आंदोलन से पहले फूलबाग के इस मैदान का अधिसंख्य हिस्सा में फूलों की भीनी-भीनी खूशबू से गमकता-महकता रहता था। शनै: शनै: स्थितियां बदलीं। फूलों की शानदार खूशबू से महकने वाला फूलबाग अपनी रौनक खोने लगा। स्वाधीनता आंदोलन के बाद इस मैदान में धूल के गुबार उड़ने लगे। अन्तोगत्वा, एक बार फिर परिवर्तन दिखा।


फूूलबाग के फ्रंट साइड में यादगार शिलाखण्ड के साथ ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थल को शानदार रुपरंग दिया गया। फूूलबाग मैदान के पश्चिमी हिस्से में गणेश शंकर विद्यार्थी उद्यान को मूर्त स्वरुप दिया गया। पेड़-पौधों की हरितिमा से आच्छादित उद्यान अपने अस्तित्व को बचाये हैं। सार्वजनिक समारोह के साथ अन्य आयोजन भी इस स्थल में होते रहते हैं। फूूलबाग का मुख्य मैदान.... यूं कहा जाये कि इस मैदान ने स्वाधीनता आंदोलन से लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के कई आयाम देखे। खुद का इतिहास बना तो शहर का इतिहास बनते देखा। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में सार्वजनिक बैठकों का स्थल बना तो राजनीतिक दलों की रैलियों-जनसभाओं का स्थल बन गया। 

देश के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय पण्डित जवाहर लाल नेहरू, स्वर्गीय इन्दिरा गांधी, प्रखर वक्ता एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी, चौधरी चरण सिंह, श्रीमती सोनिया गांधी, पूर्व रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव, मेगा स्टार अमिताभ बच्चन सहित देश की असंख्य नामचीन हस्तियों ने इस मैदान से संदेश दिये। इस मैदान ने ब्रिाटिश हुकूमत के हुक्मरानों के बेअंदाज तेवर देखे तो वहीं लोकतंत्र का वास्तविक अंश-स्वरुप भी अवलोकित रहा। ब्रिाटिश हुकूमत ने अपने शासनकाल में इसे महारानी विक्टोरिया गार्डेन के तौर पर पहचान दी लेकिन महारानी विक्टोरिया गार्डेन से कहीं अधिक पहचान फूलबाग के तौर पर रही। फूलबाग शहर की एक खास धरोहर है.... यह कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 





Monday, December 12, 2016

 बारादेवी मंदिर :  श्रद्धा व आस्था का सैलाब 
  'कानपुर शहर का बारादेवी मंदिर" आस्था, श्रद्धा, विश्वास का सैलाब। जी हां, उत्तर प्रदेश के प्रमुुख शहर कानपुुर के दक्षिणी इलाका में स्थित मां बारादेवी के मंदिर में आस्था, श्रद्धा एवं विश्वास दिखे तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। मान्यता है कि विश्वास है तो इस सिद्धस्थान पर हर मनोकामना की पूर्ति होगी। किवदंती है कि मां बारादेवी के इस मंदिर में कन्या स्वरुप देवी के बारह स्वरुप विद्यमान हैं। भले ही मंदिर में मां की छवि में बारह देवियों के दर्शन न हों लेकिन मां भगवती के नौ स्वरुप सहित अन्य छवियों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

 बताते हैं कि पिता से अनबन होने के कारण एक परिवार की बहनें घर का परित्याग कर इस स्थान पर आकर प्रतिष्ठापित हो गयीं थीं। मान्यता है कि मां भगवती अर्थात दुर्गा जी के सभी स्वरुप सहित कुल बारह देवी प्राण प्रतिष्ठत हैं। विशेषज्ञों की मानें तो यह करीब 1700 वर्ष पुराना मंदिर है। समय काल के क्रम में विकास होता रहा। शारदीय एवं चैत्र नवरात्र में मां बारा देवी के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का अपार समूह उमड़ता है। अब इस इलाके को ही बारादेवी के नाम से जाना-पहचाना जाता है। नवरात्र में ज्वारा निकलते हैं तो सांग धारी श्रद्धालुओं का उत्साह एवं श्रद्धा को देख कर सहज ही मान्यता का अनुमान लगाया जा सकता है। पुरातात्विक विभाग के सर्वेक्षण की मानें तो मां दुर्गा की प्रतिमा करीब 1700 साल प्राचीन है। ख्याति का आलम है कि बारादेवी के दर्शन के लिए शहर व आसपास के श्रद्धालु भारी तादाद में उमड़ते हैं।





Sunday, December 11, 2016

कानपुर का बिरहाना रोड
आभूषण की चकाचौंध
ज्वैलरी की ख्याति विदेश तक
 
       कानपुर केवल आैद्योगिक राजधानी ही नहीं। सोना-चांदी के कारोबार का भी प्रमुख केन्द्र है। शहर का बिरहाना रोड खास आभूषण-ज्वैलरी की खरीद-फरोख्त के लिए देश ही नहीं दुनिया में भी जाना-पहचाना जाता है। बात चाहे डिजाइनर ज्वैलरी की हो या परम्परागत आभूषण की हो या फिर वैवाहिक आभूषण की पसंद हो अथवा देवी-देवताओं के मुकुट से लेकर क्षत्रशाल की उपलब्धता की हो। बिरहाना रोड का ज्वैलरी मार्केट आभूषण की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

कानपुर शहर की धड़कन के तौर पर अपनी पहचान रखने वाले बिरहाना रोड में दो दर्जन से अधिक भव्य-दिव्य ज्वैलर्स शोरुम संचालित होते हैं। आभूषण का लघु कारोबार भी यहां खूब फलता-फूलता है। कोलकाता की डिजाइन की चाहत हो या फिर दक्षिण भारतीय आभूषण की चांहत हो.... बिरहाना रोड आभूषण की सभी आवश्यकताओं व पसंद को पूरा करता है। ज्वैलरी का यह कारोबार लाखों-करोड़ों नहीं बल्कि अरबोें के टर्नओवर वाला है। इस इलाके से सरकार को राजस्व भी अच्छी तादाद में मिलता है। रत्न-नगीना में भी यह बाजार पीछे नहीं है। दुनिया का कोई भी नग-नगीना चाहिए तो इस बाजार में उपलब्ध होगा। देश-दुनिया में कोलकाता के आभूषण-ज्वैलरी मशहूर है तो कानपुर के कारीगरों का हुनर भी पीछे नहीं ।

 कानपुर के कारीगरों के हाथों गढे आभूषण-ज्वैलरी देश के विभिन्न कोनों सहित दुनिया में भी पसंद किये जाते है। बल्कि यूं कहा जाए कि कानपुर के आभूषण दुनिया की महिलाओं की पसंद बने तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।  खास यह भी है कि इस मार्केट में आभूषण-ज्वैलरी की प्रदर्शनी भी लगती रहती है। जिससे महिलाओं को नए-नए डिजाइन की ज्वैलरी उपलब्ध होती है। आभूषण-ज्वैलरी की एक प्रतिस्पर्धा सी अनवरत इस मार्केट में चलती रहती है। करीब एक किलोमीटर लम्बे इलाके में फैला आभूषण-ज्वैलरी के कारोबार के साथ ही बिरहाना रोड़ के एक हिस्से में मेडिसिन मार्केट भी है हालांकि दवाओं का यह थोक बाजार है।







Tuesday, December 6, 2016

'लव-कुश बांध"  
सुन्दर एवं पर्यटन स्थल  
गंगा बैराज के नाम से ख्याति प्राप्त  
       'गंगा बैराज कानपुर" शहर को समर्पित यह परियोजना निश्चय ही कानपुर को एक बड़ी सौगात है। गंगा बैराज कानपुर का हालांकि आधिकारिक नामकरण 'लव-कुश बांध" किया गया था लेकिन इसे गंगा बैराज के नाम से ही जाना जाता है। गंगा बैराज केवल एक बैराज अथवा बांध भर नहीं बल्कि कानपुर को लखनऊ-उन्नाव से जोड़ने वाला एक बेहद सेतु भी है। शहर के पश्चिम इलाके में नवाबगंज-आजाद नगर के निकट गंगा पर बना यह बैराज पांच वर्ष की अवधि में बन कर पूर्ण हुआ। वर्ष 1995 में गंगा बैराज बनाने के लिए शिलान्यास किया गया जबकि मई 2000 में विधिवत इसे लोकार्पित कर दिया गया।


करीब छह सौ इक्कीस मीटर लम्बे इस बांध में करीब दो दर्जन गेट लगे हैं। नरोना बांध से करीब एक लाख क्यूसेक गंगा जल इस बांध के लिए नित्य छोड़ा जाता है। हालांकि बारिश का मौसम छोड़ दिया जाए तो एक लाख क्यूसेक गंगा जल की उपलब्धता नहीं होती। फोरलेन फर्राटा सड़क मार्ग की आवाजाही अनवरत बनी रहती है। इसके निर्माण में करीब 303.14 करोड़ की धनराशि खर्च की गयी थी। गंगा बैराज का निर्माण सिचाई विभाग की देखरेख में किया गया। गंगा बैराज के सभी गेट जल की निकासी हेतु नहीं खोले जाते बल्कि आवश्यकता के अनुसार गेट खुलते-बंद होते रहते हैं। गंगा बैराज शहर के सुन्दर एवं पर्यटन स्थलों में से एक है। दिल्ली-नोएड़ा के बोटैनिकल गार्डेन की तर्ज पर गंगा बैराज क्षेत्र में बोटैनिकल गार्डेन बनाने की भी योजना है। बोटैनिकल गार्डेन बन जाने से इस क्षेत्र के सौन्दर्य में आैर भी अधिक निखार आ जायेगा। विद्वानों की मानें तो 'गंगा जल का पान" सौभाग्य से मिलता है। अब यह कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी कि कानपुर के बाशिंदे सौभाग्यशाली हैं क्योंकि उनको पीने के लिए 'गंगाजल" मिल रहा है।

जी हां, गंगा बैराज से शहर के लिए जलापूर्ति की भी व्यवस्था की गयी है। करीब बारह सौ एमएलडी (मिलियन लीटर डेली) का वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगना है। हालांकि दो सौ एमएलडी क्षमता का वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लग चुका है बल्कि चालू है। इससे शहर के एक बड़े हिस्से को जलापूर्ति होती है। गंगा बैराज स्थल जहां एक ओर मनोरम एवं खूबसूरत स्थल है तो वहीं बेहद खतरनाक भी है। गंगा बैराज में गंगा स्नान के दौरान अब तक सैकड़ों मौते हो चुकी हैं। लिहाजा पुलिस प्रशासन ने गंगा बैराज क्षेत्र में गंगा स्नान करने वालों के खिलाफ कानूनी डंडा उठा लिया है। पुलिस प्रशासन ने गंगा स्नान के लिए इसे अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया है। गंगा स्नान करने की मनाही है। सैर-सपाटा करें। आनन्द लें। जीवन को जोखिम में न डालें।