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Thursday, December 22, 2016

जरीब चौकी : आैद्योगिक हलचल तो रिहायश भी 

  
       उत्तर प्रदेश की आैद्योगिक राजधानी कानपुर का कोना-कोना अपनी अलग एवं खास पहचान रखता है। चाहे वह मंदिर श्रंखला के तौर पर हो या कारोबारी इलाके शक्ल में हो। 

खास बात यह दिल्ली हावड़ा के मुख्य मार्ग पर परिवहन की व्यवस्थायें भले ही कमजोर हों लेकिन एक शहर से दूसरे शहर को जोड़ने के संसाधन-आधारभूत ढ़ाचा में कहीं कोई कमी नहीं। इस शहर के मध्य से ग्रांड ट्रंक रोड (जी. टी. रोड) गुजरता है तो वहीं कालपी रोड भी यहां से होकर निकलता है। शहर में इन दोनों मुख्य मार्गों का संगम स्थल भी है। इस स्थान को जरीब चौकी चौराहा के तौर पर जाना जाता है। जरीब चौकी चौराहा पर जी टी रोड व कालपी रोड़ एक दूसरे को क्रास करते हैं। जरीब चौकी शहर का खास इलाका माना-पहचाना जाता है। जरीब चौकी खास तौर से एक अतिमिश्रित इलाका है। इस क्षेत्र में गरीब के झोपडे़ हैं तो वहीं शहर के धनाढ्य वर्ग रिहायश भी है। सस्ते एवं अच्छे भोजनालय हैं तो वहीं कारोबार क्षेत्र भी है। 

            आैद्योगिक क्षेत्र भी यहां खास है। जरीब चौकी का नाम भले ही चौकी अर्थात चौक या फिर चौराहा हो, वस्तुत इस स्थान से शहर के विभिन्न इलाकों को जोड़ने वाले पांच मुख्य मार्ग निकलते हैं। जरीब चौकी से पूर्व दिशा की ओर जाने वाला जी. टी. रोड फतेहपुर, इलाहाबाद होते हुये हावड़ा को चला जाता है। इस मुख्य मार्ग पर आैद्योगिक इकाइयों के साथ ही अब आलीशान शोरुम्स शोभा बढ़ा रहे हैं। कभी इस इलाके में सिंह इंजीनियरिंग्स सहित कई नामचीन इकाईयां आबाद थीं। इसके ठीक बगल से पूर्व दिशा में कालपी रोड गुजरती है। यह सड़क सीधे कानपुर सेंट्रल  रेलवे स्टेशन (घंटाघर) से जोड़ती है। बॉलीवुड के मजे लेने हों तो संगीत सिनेमा हाल है तो वहीं खान-पान के लईया-पट्टी-गजक सहित बहुत कुछ मिलेगा। अलमारी की खरीद करनी हो या सोफा लेना हो, बहुत बड़ा मार्केट मिलेगा। 

             इसके उत्तर दिशा में पी. रोड है। पी. रोड सीसामऊ बाजार, गांधी नगर एवं रामबाग सहित कई इलाकों को जोड़ता है। सीसामऊ बाजार सस्ता व गुणवत्तापरक कपड़ा के लिए खास तौर से विख्र्यात है। यह रिहायशी व व्यापारिक मिला-जुला इलाका है। पश्चिम दिशा की ओर जाने वाला मुख्य मार्ग जी. टी रोड है। यह मुख्य मार्ग गुमटी नम्बर पांच से रावतपुर होते हुये कल्याणपुर आदि इलाकों को जोड़ता है। इस सड़क पर टिम्बर के कारखाने हैं तो वहीं मोटर पार्टस सहित टायर-ट्यूब की बड़ी दुकाने हैं।

गुमटी गुरुद्वारा भी इसी सड़क पर है। ह्मदय रोग संस्थान सहित कई चिकित्सा संस्थान भी इसी मार्ग पर हैं। जरीब चौकी से पश्चिम की ओर जाने वाले कालपी रोड पर शहर का एक बड़ा आैद्यंोगिक आस्थान है। कालपी रोड आैद्योगिक आस्थान में आैद्योगिक क्रियाकलाप के अलावा कल-कारखानों के साथ साथ ट्रक-मोटर्स के सुधार-मरम्मत का कार्य भी होता है। जरीब चौकी चौराहा पर एक छोटा किन्तु सुन्दर पार्क है। इसकी देखरेख नगर निगम के अधीनस्थ है। इस पार्क में महाराणा प्रताप की घोडे पर सवार प्रतिमा स्थापित है। यह शहर का अतिव्यस्तम एवं भीड़भाड़ वाला इलाका है।  

Wednesday, December 21, 2016

पेशवा की विरासत : बनखण्डेश्वर महादेव मंदिर

  
       आस्था, विश्वास एंव श्रद्धा के स्थल भी स्वाधीनता आंदोलन में क्रांतिकारियों के केन्द्र बने थे। सामान्यत: धर्म स्थल या पूजा-पाठ के स्थल पूजन-अर्चन तक ही सीमित रहते हैं लेकिन ऐसा नहीं। बिठूर स्थित भगवान शिव का मंदिर बनखण्डेश्वर महादेव का मंदिर आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा के साथ साथ क्रांतिकारियों का केन्द्र भी था। बिठूर स्थित बनखण्डेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना भी क्रांतिकारियों ने की थी। श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास के इस केन्द्र को पेशवा की विरासत कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। किवदंतियों की मानें तो बाजीराव पेशवा एक बार बिठूर आ रहे थे। मंधना के पास जंगल में रात हो गयी तो पेशवा ने जंगल में ही डेरा डाल दिया। सुबह पेशवा की नींद खुली तो देखा टीले पर एक गाय खड़ी है। 

गाय टीले पर दुग्धदान कर रही है। टीला बेल के पत्तों से ढ़का था। बाजीराव पेशवा को यह सब देख कर आश्चर्य हुआ। पेशवा ने टीला स्थल को कौतुहलवश खोदवाया तो शिवलिंग का प्राक्ट्य हुआ। विधि-विधान से शिवलिंग की स्थापना की गयी। बाजीराव पेशवा ने लक्ष्मीबाई का कर्णछेदन भी इसी स्थान पर कराया था। हर्ष-खुशी में बाजीराव पेशवा ने जयपुर से अन्य शिवलिंग मंगा कर उसी स्थान पर स्थापित कराया था। चूंकि यह वन क्षेत्र था लिहाजा ग्रामीणों के बीच 'बनखण्डेश्वर महादेव" की ख्याति हुयी। अब इस धर्म स्थल को बनखण्डेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है।

 उसी काल से इस स्थल पर दो शिवलिंग स्थापित हैं। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पेशवा की लड़ाई की रणनीति भी इसी स्थल पर बनती थी। बाजीराव पेशवा ने तात्याटोपे के साथ मिल कर इसी स्थान पर मैस्कर घाट पर हमले की रणनीति बनायी थी। बताते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हमला बोलने से पहले पेशवा बनखण्डेश्वर महादेव के दर्शन करने अवश्य जाते थे। मंदिर में माथा टेकने के बाद ही लड़ाई-सघर्ष के लिए आगे बढ़ते थे। यही वह स्थान है, जहां बाजीराव पेशवा ने तात्याटोपे को अपना सिपहसलार बनाया था। भेंट स्वरुप तात्या को टोपी दी थी। इसी के बाद तात्या का नाम टोपे पड़ गया। स्वाधीनता आंदोलन की अधिसंख्य रणनीति इसी स्थान पर बनती थी। आस्था है कि बेल पत्र पर अपनी मनौती लिख कर बनखण्डेश्वर महादेव को अर्पित करने से इच्छित मनोकामना की पूर्ति होती है। शहर से करीब बीस किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर की मान्यता यह भी है कि श्रावण मास में एक सौ एक बेल पत्र बनखण्डेश्वर महादेव को अर्पित करने से मनोकामना पूर्ण होती है। 

ब्रिटिश हुकूमत व स्वाधीनता आंदोलन की जंग में ब्रिाटिश हुकूमत को सतना में पेशवा का खजाना नहीं मिला तो ब्रिटिश हुकूमत खिसिया गयी। ब्रिाटिश हुकूमत को पता चला कि पेशवा ने अपना खजाना बिठूर-मंधना स्थित मंदिर में छिपा रखा है। खजाना हासिल करने के लिए ब्रिाटिश हुकूमत ने मंदिर में हमला बोल दिया लेकिन ब्रिाटिश सैनिकों को उल्टे पांव भागना पड़ा क्योंकि सांप-बिच्छू एवं मधुमक्खियों ने सैनिकों पर हमला बोल दिया था। बताते हैं कि भगवान शिव के इस स्वरुप अर्थात बनखण्डेश्वर महादेव मंदिर की रक्षा-सुरक्षा आज भी सांप-बिच्छू व मधुमक्खियां करते हैं। खास बात यह है कि बनखण्डेश्वर महादेव की तीन प्रहर पूजन-अर्चन किया जाता है। खास तौर से श्रावण मास में भव्यता अलग ही रहती है। बाजीराव पेशवा ने बनखण्डेश्वर महादेव के पूजन-अर्चन के लिए बिठूर के एक ब्रााह्मण को रखा था। उसी परिवार का ब्रााह्मण अभी पूजन-अर्चन करता-कराता है। श्रावण मास में इसी क्षेत्र में भव्य-दिव्य मेला लगता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु-भक्त दर्शन-पूजन एवं मनौती के लिए आते हैं। 

Tuesday, December 20, 2016

एल्गिन मिल्स : डेढ़ सौ वर्ष का सफर पूरा

  
       'आवश्यकता" न हो तो कुछ भी न हो। या यूं कहें कि आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है। उत्तर प्रदेश का कानपुर शहर यूं ही 'एशिया का मैनचेस्टर" नहीं बना। कुछ आवश्यकता ही थी कि ब्रिाटिश हुक्मरानों को कानपुर को आैद्योगिक राजधानी के तौर पर विकसित करना पड़ा। शहर का विकास होने से आवश्यकतायें भी बढ़ने लगीं।  

कानपुर का एल्गिन मिल शायद शहर का पहला बड़ा मिल बना। विशेषज्ञों की मानें तो कपास से वस्त्र उत्पादन करने वाला एल्गिन मिल शहर का पहला मिल था। अब तो यह मिल स्थापना के एक सौ पचास वर्ष अर्थात वर्षगांठ मना चुका है। इस मिल की स्थापना 1864 में एल्गिन मिल्स के तौर पर की गयी थी। एल्गिन मिल्स ब्रिाटिश इण्डिया कारपोरेशन की सहायक कम्पनी के तौर पर स्थापित हुयी थी। स्थापना से अब तक डेढ़ सौ वर्ष से भी अधिक समय में एल्गिन मिल्स ने असंख्य उतार-चढ़ाव देखे। श्रमिक संघर्ष भी दिखा तो वहीं एल्गिन मिल्स में उत्पादन को पुन: चालू करने की तमाम कोशिशें भी हुयीं। डेढ़ सौ वर्ष के इस सफर में जहां एक ओर मिल ने हजारों रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये तो वहीं इस मिल का वस्त्र उत्पाद देश-विदेश तक पहंुचता रहा।


 विशेषज्ञों की मानें तो देश की स्वाधीनता से पहले ब्रिाटिश सैनिकों को कपड़ा व अन्य उपयोग की आवश्यकताओं की उपलब्धता को ध्यान रख कर मिल की स्थापना की गयी। कपास से विभिन्न प्रकार के कपड़ों का उत्पादन किया जाता था। ब्रिाटिश सैनिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ कपड़ा उत्पाद देश एवं विदेशों को भेजा जाता था। यह कहा जाये कि पूर्वांचल सहित आसपास के इलाकों के लोगों को रोजगार भी मिला। शनै: शनै: मिल बीमार होने लगी। मिल का पुनरुद्धार करने की कोशिशें भी हुयीं। आैद्योगिक एवं वित्तीय पुर्ननिर्माण बोर्ड ने वित्तीय सहायता के तौर पर 193 करोड़ का आर्थिक पैकेज दिया गया जिससे मशीनरी का बदलाव एवं श्रमिकों का बकाया वेतन भुगतान किया जा सके। बोर्ड ने प्रस्ताव पारित कर एक बार फिर करघों को बेंच कर 15 करोड़ की धनराशि जुटायी गयी। कुछ समय मिल चलने के बाद एक बार फिर स्पीड ब्रोकर आ गया। इसके बाद केन्द्रीय आर्थिक सहायता का दौर निरन्तर जारी रहा। पार्वती बागला रोड स्थित इस मिल से ताल्लुक रखने वाली अरबों की सम्पत्तियां अभी भी हैं।  


Monday, December 19, 2016

वीआईपी रोड : शहर की अतिविशिष्ट झलक

  
       कानपुर शहर की शान 'वीआईपी" रोड। वीआईपी रोड शहर की शान हो भी क्यों नहीं। शासन-सत्ता के गलियारों की कोई विशिष्ट हस्ती को शहर से गुजरना हो या घनी आबादी को छोड़ कर शहर क्रास करना हो या फिर शहर के अतिविशिष्ट रिहायशी इलाको को एक दृष्टि अवलोकित करना हो तो इस वीआईपी रोड से गुजरना पड़ेगा। हालांकि शहर को क्रास करने के लिए अब तो हाईवे उपलब्ध है लेकिन वीआईपी रोड भी एक आसान, साफ-सुथरा व सुगम यातायात का एक विकल्प है।

वीआईपी रोड शहर को ग्रांड ट्रंक रोड (जीटी रोड) से जोड़ता है तो वहीं शहर का एक अंदाज भी इस सड़क से गुजरने पर दिख जाता है। मॉल रोड से प्रारम्भ होकर कम्पनी बाग चौराहा तक जाने वाले वीआईपी रोड करीब छह किलो लम्बा सफर है। यूं कहा जाये कि वीआईपी रोड शहर की धड़कन है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। इस वीआईपी रोड को पार्वती बागला रोड के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि यह रोड मॉल रोड से प्रारम्भ होकर कम्पनी बाग होते हुये रावतपुर को जोड़ता है। मॉल रोड से इस रोड पर प्रवेश करते ही शासकीय अफसरों के दफ्तरों से लेकर उनके शानदार-आलीशान आशियानों की एक श्रंखला प्रारम्भ होती है। आलीशान आशियानों की यह श्रंखला कम्पनी बाग दिखती है। इसी रोड पर कचहरी (कलेक्ट्रेट) है तो उसके ठीक सामने जिला कारागार है। पुलिस लाइन भी इसी इलाके में है। पुुलिस लाइन के ठीक चंद कदम के बाद गोरा कब्रिास्तान है। इस कब्रिास्तान को पुर्तगाली कारीगरों ने अपने हुनर से तराशा था। वस्तुत: यह ब्रिाटिश सैनिकों का कब्रागाह है। इसी रोड पर क्रिकेट प्रेमियों का विशाल खेलमैदान 'ग्रीनपार्क" है।


उत्तर प्रदेश स्टॉक एक्सचेंज भी इसी इलाके में दृश्यावलोकित होता है। शहर के शानदार प्रेक्षागृह में शुमार मर्चेन्ट्स चेम्बर भी इसी रोड है। वस्तुत: इसे नाट्य हलचल का केन्द्र कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। स्वास्थ्य सेवाओं के लिहाज से भी यह स्थान शहर में अव्वल है। निजी नर्सिंग होम्स के अलावा जार्जिया मैकरॉबर्ट मेमोरियल अस्पताल की सेवायें भी इसी क्षेत्र में उपलब्ध होती है। एल्गिन मिल्स भी इस रोड की शान है। एल्गिन मिल्स शायद शहर की पहली कपास मिल है। इसी स्थान पर उत्तर प्रदेश वस्त्र प्रौद्योगिकी संस्थान है। संस्थान से प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में छात्र तकनीकि ज्ञानार्जन कर निकलते हैं। खास बात यह कि शहर के अधिसंख्य बाशिंदों की अंतिम यात्रा इस मार्ग से ही पूूर्ण होती है क्योंकि चाहे भगवतदास श्मशान घाट जाना हो या फिर भैंरोंघाट श्मशान घाट, इस वीआईपी रोड से ही गुजरना होता है। हालांकि यह दोनों ही श्मशान घाट गंगा तट पर हैं लेकिन श्मशान घाट की सड़कों का जुड़ाव वीआईपी रोड से है।  


Sunday, December 18, 2016

मां कुष्माण्डा देवी : जल करे रोगी को निरोग
 
        रोगों से मुक्ति पाएं। मां कुण्माण्डा देवी के चरणों के जल को ग्रहण करें। निश्चय ही शरीर स्वस्थ्य एवं निरोगी होगा। 'मां कुष्माण्डा देवी" के भक्तों-श्रद्धालुओं के बीच तो यही मान्यता है। मां कुष्माण्डा देवी के चरणों का जल नेत्ररोगों में भी लाभकारी है। कानपुर शहर से करीब चालीस किलोमीटर दूर घाटमपुर में स्थित मां भगवती के इस स्वरुप के दर्शन करने बड़ी संख्या में भक्त उमड़ते हैं। करीब एक हजार वर्ष पुराने इस मंदिर की अपनी एक अलग गाथा है। मंदिर में मां भगवती के इस स्वरुप की लेटी प्रतिमा है। मां का यह स्वरुप एक पिण्डी के रुप में है। खासियत यह है कि प्रतिमा से जल का रिसाव अनवरत होता रहता है। मान्यता है कि इस जल को ग्रहण करने से सभी प्रकार के असाधारण-असाध्य एवं सामान्य रोग का निवारण हो जाता है। नेत्र रोग में इस जल को आंखों में लगाने से लाभ मिलता है। 

सूर्योदय से पूर्व स्नान कर मां भगवती कुष्माण्डा के दर्शन कर जल ग्रहण करने से निश्चित कोई भी असाध्य रोग हो, ठीक हो जाता है। छह माह तक जल ग्रहण करने से शरीर पूर्णतय: स्वस्थ्य हो जाता है। प्रतिमा से जल का रिसाव कैसे व कहां से होता है ? यह रहस्य बना हुआ है। इस रहस्य को वैज्ञानिक भी नहीं खोज पाए। इस मंदिर-मठिया का निर्माण राजा दर्शन ने वर्ष 1380 में कराया था। यह स्थान मां की मठिया के रुप में था। किवंदती है कि घाटमपुर के इस इलाके में प्राचीनकाल में घना जंगल था। कुड़हा नामक ग्वाला गाय चराने इस जंगल में आता था। ग्वाला गाय तो चराता लेकिन गाय दुग्धदान नहीं करती। इससे ग्वाला परेशान था। अन्तोगत्वा, एक दिन ग्वाला ने देखा कि एक स्थान पर गाय ने दुग्धदान किया।


 रात्रिकाल में मां भगवती ने ग्वाला का स्वप्न दिया कि दुग्धदान का स्थान मां भगवती का स्थान है। ग्वाला ने यह स्वप्न राजा दर्शन को बताया। इसके बाद ग्वाला ने उस स्थान की खोदाई करायी तो मां भगवती के इस स्वरुप पिण्डी का प्राक्ट्य हुआ। ग्वाला कुड़हा व अन्य ग्रामीणों ने मां भगवती के इस स्वरुप पिण्डी को उसी स्थान पर स्थापित कर दिया। पिण्डी से जल रिसाव हो रहा था। यह देख ग्रामीण आश्चर्यचकित थे। जल को ग्रामीणों ने प्रसाद के तौर पर ग्रहण किया। बाद में राजा दर्शन ने इस स्थान पर मठिया-मंदिर का निर्माण कराया। ग्वाला का नाम कुड़हा था लिहाजा इलाके में कुड़हा देवी के नाम से भगवती के इस स्वरुप की ख्याति हुयी। अब मां भगवती के इस स्वरुप को कुड़हा देवी एवं कुष्माण्डा देवी के तौर पर ख्याति है। मां भगवती के इस स्वरुप को सती के चौथा अंश माना जाता है। शारदीय एवं चैत्र नवरात्र में मंदिर क्षेत्र में विशाल एवं भव्य मेला लगता है। 

इसे आसपास के इलाके का सबसे बड़ा मेला माना जाता है। मनोकामना के लिए भक्त एवं श्रद्धालु माता को चुनरी, ध्वजा, नारियल, घंटा आदि भेंट स्वरुप चढ़ाते हैं। पुआ व भीगे चने भी मां को अपर्ण किये जाते हैं। बताते हैं कि 1890 में चंदीदीन भुर्जी ने इस मंदिर का भव्य-दिव्य निर्माण कराया था। वर्ष 1988 सितम्बर से मंदिर में मां कुष्माण्डा की अखण्ड ज्योति जल रही है। मंदिर परिसर में ही दो विशाल एवं भव्य तालाब हैं। इन तालाब में भक्त एवं श्रद्धालु स्नान करते है तो श्री कृष्ण की नाग नाथने की लीला भी इसी जलक्षेत्र में होती है। इस अवसर पर विशाल मेला लगता है। खास बात यह है कि यह तालाब कभी नहीं सूखते। इस जलाशय का जल मां को अर्पित किया जाता है। नवरात्र की चतुर्थी को मां कुष्माण्डा देवी मंदिर परिसर में दीपदान महोत्सव भी होता है। इस दीपदान महोत्सव को देखने दूरदराज से भक्त बड़ी संख्या में आते है। श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का यह केन्द्र अब पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बना रहा है।   

Friday, December 16, 2016

मां बुद्धादेवी मंदिर :
भोग में सिर्फ हरी सब्जियां
  
       कानपुर को आैद्यागिक राजधानी के साथ ही मंदिरों का शहर कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। मंदिर श्रंखला प्राचीनकाल की। शहर के ह्मदयस्थल खोया बाजार-मेस्टन रोड इलाके में मां भगवती बुद्धादेवी का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर की भी अपनी मान्यताएं एवं परम्पराएं हैं। शहर के खोया बाजार-हटिया बाजार के मध्य स्थित इस मंदिर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ अनवरत बनी रहती है। खास तौर से नवरात्र के दिनों में तो श्रद्धालुओं की अपार भीड़ होना लाजिमी हो जाता है। श्रद्धालुओं के हाथों में फूूल-प्रसाद की डलिया व मां भगवती के जयघोष से अनुगूंजित नारों से परिवेश। खास बात यह है कि मां भगवती बुद्धा देवी को प्रसाद में ताजी एवं हरी सब्जियां ही भेंट की जाती है। सब्जियों में मसलन लौकी, बैंगन, पालक, टमाटर, गाजर, मूली, तरोई, हरी मटर, सीताफल, टीण्डा, भिण्डी एवं आलू आदि मां को प्रसाद में भेंट किये जाते है। मां भगवती के इस स्वरुप को मां बुद्धादेवी के नाम से ख्याति मिली। गौरतलब है कि इस मंदिर में न तो कोई पुजारी है आैर न कोई पुरोहित। 


माली ही मंदिर की व्यवस्था संभालते हैं। मंदिर सौ वर्ष से अधिक पुराना है। प्राचीनकाल में इस स्थान पर फूल-पौधों से आच्छादित बागीचा था। इस बागीचा की देखरेख माली परिवार करता था। माली परिवार के मुखिया को रात स्वप्न में मां भगवती ने दर्शन दिये। स्वप्न एवं दर्शन का सिलसिला अनवरत चलता रहा। अन्तोगत्वा, माली ने बागीचा में खोदाई करायी तो खोदाई में मां भगवती के इस स्वरुप का प्राक्ट्य हुआ। खोदाई दिन तक अनवरत चली। मां भगवती के इस स्वरुप बुद्धादेवी की स्थापना के लिए चबूतरा बना। चबूतरा पर मां बुद्धादेवी की स्थापना की गयी। चूंकि मां बुद्धादेवी का प्राक्ट्य बागीचा से हुआ लिहाजा भक्त-श्रद्धालु प्रसाद में ताजी एवं हरी सब्जियां चढ़ाने लगे। धीरे-धीरे प्रसाद में हरी एवं ताजी सब्जी चढ़ाने की परम्परा बन गयी। शनै: शनै: चबूतरा ने भी मंदिर का स्वरुप ले लिया। मान्यता है कि मां बुद्धादेवी अपने भक्तों की हर मुराद पूरी करती है।   


Thursday, December 15, 2016


मूलगंज : बाबू जी क्या क्या खरीदोगे !
सुबह 'दिहाड़ी मजदूर मण्डी" दिन भर बाजार आबाद  
            कानपुर शहर का 'मूलगंज" ! जी हां, यह इलाका मूलगंज अपने खास अंदाज के लिए शहर क्या आसपास के इलाकों में खासा पहचाना जाता है। 'मूलगंज" का नाम आते ही किसी के चेहरे पर मुस्कान नाच उठती है तो वहीं खास-ओ-आम के बाजार का अक्स उभरता है।

              'मूूलगंज" अपने आप में एक समग्र बाजार। दिहाड़ी मजदूर चाहिए या र्इंजन चाहिए या फिर कपड़े-लत्ते नये-पुराने कुछ भी या फिर जिस्म की भूख मिटानी हो। हर जरुरत पूरी करे सिर्फ 'मूलगंज"। हालांकि 'मूलगंज" की चारों दिशाओं में अलग-अलग मुख्य मार्ग-अलग-अलग मुख्य मार्केट। फिर भी समग्रता में चौतरफा इलाका मूलगंज ही माना जाता है। 'मूलगंज" चौराहा से पूूरब की ओर मेस्टन रोड, पश्चिम में लाटूश रोड, उत्तर में नई सड़क आैर दक्षिण में हालसी रोड का इलाका आता है।

'मूलगंज" चौराहा पर सुबह 'दिहाडी मजदूर मण्डी" आबाद होती है तो वहीं दिन भर से रात तक व्यापारिक चहल-पहल रहती है। 'दिहाड़ी मजदूर मण्डी" में शायद ही कोई ऐसा किस्म हो जिसका मजदूर न मिले। मूलगंज चौराहा-चौक ने भी शहर का इतिहास देखा। स्वाधीनता आंदोलन में क्रांतिकारियों के तेवर देखे तो वहीं देश में लोकसभा से लेकर राष्ट्रपति तक चुनाव लड़ने वाले भगवती प्रसाद दीक्षित 'घोड़े वाला" की जनसभायें भी देखीं। 'घोड़े वाला" की जनसभाओं में चौक-चौराहा खचाखच भरा रहता था। कहीं पैर रखने की जगह नहीं होती थी।


           अब तो इस इलाके में शहर का सबसे बड़ा जूता-चप्पल मार्केट सज गया।  फिर भी 'बाबूजी" धीरे चलना जरा संभलना बड़े धोखे हैं इस राह में.... जी हां, मूलगंज 'नगर बधुओं" का इलाका भी है। 'नगर बधुओं" से मुलाकात-मुस्कान किसी के चेहरे को खिला देती है तो किसी को बर्बाद भी कर देती है। 'मूलगंज" के इस हसीन बाजार को 'रोटी वाली गली" व 'नील वाली गली" के नाम से जाना जाता है। हालांकि 'नगर बधुओं" को प्रशासन के तेवर देख कर मूलगंज का यह इलाका छोड़ना पड़ा। फिर भी 'नगर बधुओं" की रौनक से इलाका आबाद रहता है। मूलगंज का लाटूश रोड इलाका मशीनरी उद्योग-कारोबार का क्षेत्र है।


            चाहे सिलाई मशीन की खरीद करनी हो या डीजल र्इंजन-पम्प चाहिए। खराद से लेकर छोटे-बड़े मशीनरी पुर्जे भी इस बाजार में उपलब्ध होते हैं। मूलगंज-मेस्टन रोड इलाके के बाजारों के घर गृहस्थी का छोटा से बड़ा हर सामान उपलब्ध रहता है। चाहे बिजली का सामान खरीदना हो या फिर कपड़े-लत्ते की खरीदारी करनी हो। खास यह कि मूलगंज का दिल शहर के लिए धड़कता है तो वहीं शहर का दिल भी मूलगंज के लिए धड़कता है। मूलगंज में देशी घी के स्वादिष्ट व्यंजन उपलब्ध होते हैं तो वहीं खोया बाजार भी स्वाद को बढ़ाता है। मूलगंज के खोया-मावा की ख्याति दूर-दूर तक है। आसपास के व्यापारी इसी बाजार में दुग्ध उत्पाद बेंचने आते हैं। वहीं मूलगंज का नई सड़क इलाका 'दबंगों" के नाम हमेशा से रहा।