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Monday, December 12, 2016

 बारादेवी मंदिर :  श्रद्धा व आस्था का सैलाब 
  'कानपुर शहर का बारादेवी मंदिर" आस्था, श्रद्धा, विश्वास का सैलाब। जी हां, उत्तर प्रदेश के प्रमुुख शहर कानपुुर के दक्षिणी इलाका में स्थित मां बारादेवी के मंदिर में आस्था, श्रद्धा एवं विश्वास दिखे तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। मान्यता है कि विश्वास है तो इस सिद्धस्थान पर हर मनोकामना की पूर्ति होगी। किवदंती है कि मां बारादेवी के इस मंदिर में कन्या स्वरुप देवी के बारह स्वरुप विद्यमान हैं। भले ही मंदिर में मां की छवि में बारह देवियों के दर्शन न हों लेकिन मां भगवती के नौ स्वरुप सहित अन्य छवियों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

 बताते हैं कि पिता से अनबन होने के कारण एक परिवार की बहनें घर का परित्याग कर इस स्थान पर आकर प्रतिष्ठापित हो गयीं थीं। मान्यता है कि मां भगवती अर्थात दुर्गा जी के सभी स्वरुप सहित कुल बारह देवी प्राण प्रतिष्ठत हैं। विशेषज्ञों की मानें तो यह करीब 1700 वर्ष पुराना मंदिर है। समय काल के क्रम में विकास होता रहा। शारदीय एवं चैत्र नवरात्र में मां बारा देवी के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का अपार समूह उमड़ता है। अब इस इलाके को ही बारादेवी के नाम से जाना-पहचाना जाता है। नवरात्र में ज्वारा निकलते हैं तो सांग धारी श्रद्धालुओं का उत्साह एवं श्रद्धा को देख कर सहज ही मान्यता का अनुमान लगाया जा सकता है। पुरातात्विक विभाग के सर्वेक्षण की मानें तो मां दुर्गा की प्रतिमा करीब 1700 साल प्राचीन है। ख्याति का आलम है कि बारादेवी के दर्शन के लिए शहर व आसपास के श्रद्धालु भारी तादाद में उमड़ते हैं।





Sunday, December 11, 2016

कानपुर का बिरहाना रोड
आभूषण की चकाचौंध
ज्वैलरी की ख्याति विदेश तक
 
       कानपुर केवल आैद्योगिक राजधानी ही नहीं। सोना-चांदी के कारोबार का भी प्रमुख केन्द्र है। शहर का बिरहाना रोड खास आभूषण-ज्वैलरी की खरीद-फरोख्त के लिए देश ही नहीं दुनिया में भी जाना-पहचाना जाता है। बात चाहे डिजाइनर ज्वैलरी की हो या परम्परागत आभूषण की हो या फिर वैवाहिक आभूषण की पसंद हो अथवा देवी-देवताओं के मुकुट से लेकर क्षत्रशाल की उपलब्धता की हो। बिरहाना रोड का ज्वैलरी मार्केट आभूषण की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

कानपुर शहर की धड़कन के तौर पर अपनी पहचान रखने वाले बिरहाना रोड में दो दर्जन से अधिक भव्य-दिव्य ज्वैलर्स शोरुम संचालित होते हैं। आभूषण का लघु कारोबार भी यहां खूब फलता-फूलता है। कोलकाता की डिजाइन की चाहत हो या फिर दक्षिण भारतीय आभूषण की चांहत हो.... बिरहाना रोड आभूषण की सभी आवश्यकताओं व पसंद को पूरा करता है। ज्वैलरी का यह कारोबार लाखों-करोड़ों नहीं बल्कि अरबोें के टर्नओवर वाला है। इस इलाके से सरकार को राजस्व भी अच्छी तादाद में मिलता है। रत्न-नगीना में भी यह बाजार पीछे नहीं है। दुनिया का कोई भी नग-नगीना चाहिए तो इस बाजार में उपलब्ध होगा। देश-दुनिया में कोलकाता के आभूषण-ज्वैलरी मशहूर है तो कानपुर के कारीगरों का हुनर भी पीछे नहीं ।

 कानपुर के कारीगरों के हाथों गढे आभूषण-ज्वैलरी देश के विभिन्न कोनों सहित दुनिया में भी पसंद किये जाते है। बल्कि यूं कहा जाए कि कानपुर के आभूषण दुनिया की महिलाओं की पसंद बने तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।  खास यह भी है कि इस मार्केट में आभूषण-ज्वैलरी की प्रदर्शनी भी लगती रहती है। जिससे महिलाओं को नए-नए डिजाइन की ज्वैलरी उपलब्ध होती है। आभूषण-ज्वैलरी की एक प्रतिस्पर्धा सी अनवरत इस मार्केट में चलती रहती है। करीब एक किलोमीटर लम्बे इलाके में फैला आभूषण-ज्वैलरी के कारोबार के साथ ही बिरहाना रोड़ के एक हिस्से में मेडिसिन मार्केट भी है हालांकि दवाओं का यह थोक बाजार है।







Tuesday, December 6, 2016

'लव-कुश बांध"  
सुन्दर एवं पर्यटन स्थल  
गंगा बैराज के नाम से ख्याति प्राप्त  
       'गंगा बैराज कानपुर" शहर को समर्पित यह परियोजना निश्चय ही कानपुर को एक बड़ी सौगात है। गंगा बैराज कानपुर का हालांकि आधिकारिक नामकरण 'लव-कुश बांध" किया गया था लेकिन इसे गंगा बैराज के नाम से ही जाना जाता है। गंगा बैराज केवल एक बैराज अथवा बांध भर नहीं बल्कि कानपुर को लखनऊ-उन्नाव से जोड़ने वाला एक बेहद सेतु भी है। शहर के पश्चिम इलाके में नवाबगंज-आजाद नगर के निकट गंगा पर बना यह बैराज पांच वर्ष की अवधि में बन कर पूर्ण हुआ। वर्ष 1995 में गंगा बैराज बनाने के लिए शिलान्यास किया गया जबकि मई 2000 में विधिवत इसे लोकार्पित कर दिया गया।


करीब छह सौ इक्कीस मीटर लम्बे इस बांध में करीब दो दर्जन गेट लगे हैं। नरोना बांध से करीब एक लाख क्यूसेक गंगा जल इस बांध के लिए नित्य छोड़ा जाता है। हालांकि बारिश का मौसम छोड़ दिया जाए तो एक लाख क्यूसेक गंगा जल की उपलब्धता नहीं होती। फोरलेन फर्राटा सड़क मार्ग की आवाजाही अनवरत बनी रहती है। इसके निर्माण में करीब 303.14 करोड़ की धनराशि खर्च की गयी थी। गंगा बैराज का निर्माण सिचाई विभाग की देखरेख में किया गया। गंगा बैराज के सभी गेट जल की निकासी हेतु नहीं खोले जाते बल्कि आवश्यकता के अनुसार गेट खुलते-बंद होते रहते हैं। गंगा बैराज शहर के सुन्दर एवं पर्यटन स्थलों में से एक है। दिल्ली-नोएड़ा के बोटैनिकल गार्डेन की तर्ज पर गंगा बैराज क्षेत्र में बोटैनिकल गार्डेन बनाने की भी योजना है। बोटैनिकल गार्डेन बन जाने से इस क्षेत्र के सौन्दर्य में आैर भी अधिक निखार आ जायेगा। विद्वानों की मानें तो 'गंगा जल का पान" सौभाग्य से मिलता है। अब यह कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी कि कानपुर के बाशिंदे सौभाग्यशाली हैं क्योंकि उनको पीने के लिए 'गंगाजल" मिल रहा है।

जी हां, गंगा बैराज से शहर के लिए जलापूर्ति की भी व्यवस्था की गयी है। करीब बारह सौ एमएलडी (मिलियन लीटर डेली) का वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगना है। हालांकि दो सौ एमएलडी क्षमता का वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लग चुका है बल्कि चालू है। इससे शहर के एक बड़े हिस्से को जलापूर्ति होती है। गंगा बैराज स्थल जहां एक ओर मनोरम एवं खूबसूरत स्थल है तो वहीं बेहद खतरनाक भी है। गंगा बैराज में गंगा स्नान के दौरान अब तक सैकड़ों मौते हो चुकी हैं। लिहाजा पुलिस प्रशासन ने गंगा बैराज क्षेत्र में गंगा स्नान करने वालों के खिलाफ कानूनी डंडा उठा लिया है। पुलिस प्रशासन ने गंगा स्नान के लिए इसे अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया है। गंगा स्नान करने की मनाही है। सैर-सपाटा करें। आनन्द लें। जीवन को जोखिम में न डालें।



Monday, December 5, 2016

 कानपुर का जाजमऊ : सूफी संत मखदूम शाह की दरगाह भी एक शान
 
  'ताजमहल" जैसी खूूबसूरती देखनी है तो एक बार कानपुर शहर की जिन्नात की मस्जिद भी देखें। जी हां, भले ही आगरा जैसा पर्यटन स्थल न दिखे लेकिन 'खासियत" में कहीं कोई कमी नहीं मिलेगी। कानपुर शहर का पूर्वी इलाका 'जाजमऊ" के नाम से विख्यात है। 'जाजमऊ" खासियत-खूबियों से लबरेज है।

जाजमऊ में सूफी संत की दरगाह है तो वहीं वास्तुकला के अनुपम उक्करण अवलोकित होते हैं। जाजमऊ की खोदाई में 1200-1300 शताब्दी के बर्तन व कलाकृतियां भी मिलीं। 'जाजमऊ टीला" की खोदाई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने करायी थी। इस खोदाई में असंख्य बहुमूल्यवान वस्तुयें प्राप्त हुयीं। हालांकि वर्तमान में यह कानपुर संग्रहालय में शोभायमान हैं। देश के चमड़ा उत्पादक शहरों में कानपुर का नाम भी शीर्ष पर है। कानपुर का चमड़ा उद्योग खास तौर से जाजमऊ में ही क्रेन्द्रित है। जाजमऊ का टीला प्रसिद्ध है। जाजमऊ का टीला काट कर ही लखनऊ-उन्नाव को जोड़ने वाला शहर का दूसरा पुल बनाया गया। हालांकि यह टीला आज भी अपनी आन-बान-शान के साथ विद्यमान है।

इसी टीला पर ही 'जिन्नात की मस्जिद" है। इस मस्जिद की खूबसूरती वास्तुकला एवं सफेद रंग के लिए प्रसिद्ध है। इस मस्जिद के निर्माण की खास बात यह रही कि एक रात में ही इस मस्जिद का निर्माण हो गया। किसी ने मस्जिद को बनते नहीं देखा। किसी अदृश्य शक्ति ने इसका निर्माण किया। बताते हैं कि हिजरी 1092 में जिन्नात मस्जिद का निर्माण हुआ। इस मस्जिद का इतिहास करीब 350 साल पुराना है। सूफी संत मखदूम शाह बाबा की दरगाह पर शीश नवाने दूर-दराज से लोग जाजमऊ आते हैं। फिरोजशाह तुगलक ने 1358 में मखदूम शाह बाबा का मकबरा बनवाया था।

 मुगलशासक आैरंगजेब के सिपहसलार कुलीच खान ने जाजमऊ इलाके में 1679 के आसपास चार मस्जिदों का निर्माण कराया था। कुलीच खान खुद हैदराबाद के निजाम खानदान से ताल्लुक रखते थे। वर्ष 2006 में शहर को लखनऊ-उन्नाव को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा करने के लिए जाजमऊ की एक बार फिर खोदाई की गयी तो इस खोदाई में पुरातनकाल के बर्तन, कलाकृतियां व अन्य साज-ओ-सामान मिला। इसे कानपुर संग्रहालय में रखा गया। इसी इलाके में हबीबा की मस्जिद भी है। जाजमऊ में लाल बंगला, हरजिन्दर नगर, केडीए मार्केट, डिफेंस कालोनी, पुराना जाजमऊ, चमड़े के कारखाने, वाजिदपुर, जम्मू कश्मीर कालोनी, छबीले पुरवा, गज्जू का पुरवा, पोखरपुर, परदेवनपुरवा, गौशाला, रामेश्वरधाम, विमान नगर, बीबीपुर, जग्गीपुरवा, ग्रेटर कैलाश, चंदननगर, कैलाश नगर व शिवकटरा आदि इलाके-मोहल्ला आदि आते हैं। जाजमऊ में छोटे कारखाना से लेकर बड़ी टेनरी तक करीब तीन सौ चर्म उद्योग संचालित होते हैं। दरगाह-मकबरा में श्रद्धा से शीश नवाते हैं तो बहुसंख्यक रोजगार के अवसर भी उपलब्ध होते हैं। 



Sunday, December 4, 2016


ब्रिटिश सैनिकों की याद-स्मारक
कानपुर मेमोरियल चर्च
 
       'स्वाधीनता आंदोलन" ब्रिटिश हुकूमत के लिए भी कम पीड़ादायक नहीं रहा। स्वाधीनता आंदोलन में जहां एक ओर ब्रिटिश हुक्मरान हिन्दुस्तानियों पर जुल्म ढहाने में पीछे नहीं रहे तो उनको भी 'अपनों" को बड़ी तादाद में खोना पड़ा। चाहे 'बीबीघर काण्ड" हो या फिर 'कानपुर की घेराबंदी" हो। हिन्दुस्तानियों के उग्र तेवर देख कर ब्रिटिश हुक्मरानों के भी होश उड़ गये थे। वर्ष 1875 में 'कानपुर की घेराबंदी" में बड़ी तादाद में ब्रिाटिश सैनिक मारे गये। अफसोस-आक्रोश के अलावा ब्रिाटिश शासक कुछ नहीं कर सके।

मृत सैनिकों के 'स्मरण-याद" में कानपुर के छावनी क्षेत्र में 'कानपुर मेमोरियल चर्च" एवं 'स्मारक उद्यान" का निर्माण किया गया। कानपुर मेमोरियल चर्च को पहले 'ओल सोल्स कैथेड्रल चर्च" के नाम से जाना जाता था। कानपुर क्लब के पास एलबर्ट रोड पर स्थित कानपुर मेमोरियल चर्च का निर्माण मृत ब्रिटिश सैनिकों के याद के साथ ही वास्तु शिल्प का एक विशिष्ट आयाम है। इस चर्च का डिजाइन पश्चिम बंगाल में रेलवे में कार्यरत वास्तुकार वाल्टर ग्रानविले ने किया था। उस समय कानपुर को कावनपुर के नाम से जाना जाता था। लौम्बार्ड संचरना पर बने इस चर्च के एक किनारे ब्रिटिश सैनिक कब्रिस्तान है। इस चर्च के एक हिस्से में स्मारक उद्यान भी है। चर्च में गोथिक शैली भी दिखती है। लाल र्इंट से बना यह चर्च विशेष आकर्षण का केन्द्र है। स्मारक उद्यान को हेनरी यूल ने डिजाइन किया था। इस उद्यान के दो प्रवेश द्वार हैं। खूबसूरत एवं नक्काशीदार परिसर में एक खूबसूूरत परी विशेष आकर्षित करती है। यह स्थल शांति के प्रतीक के तौर पर माना जाता है।

केन्द्र में एक देवदूत की प्रतिमा स्थापित है। इसकी भुजायें एक दूसरे के उपर हो गयी हैं। यह प्रतिमा एक तोरण को थामे है। इसे विश्व शांति का प्रतीक माना जाता है। इस मूर्ति का निर्माण मूर्तिकार बारों कार्लो मारोचेट्टी ने किया था। यह ऐतिहासिक चर्च अपने में असंख्य संस्मरण समेटे है। वर्ष 1875 के बाद संरचनाओं में कई परिवर्तन भी किये गये। चूंकि चर्च को एक स्मारक स्थल के तौर पर देखा जाता है लिहाजा 1857 के सशस्त्र संघर्ष सहित अनेक प्रसंगों को रेखांकित किया गया है। ललित कला के साथ ही मध्ययुगीन विचार धारा भी अवलोकित होती है। इमारत के भीतर कलाकृतियां एवं रेखांकन अतीत से रुबरु कराते हैं।  





Friday, December 2, 2016

देश का तीसरा सबसे बड़ा कानपुर का चिड़ियाघर
'देश का तीसरा सबसे बड़ा चिड़ियाघर" ! जी हां, यह गौरव कानपुर के एलेन फॉरेस्ट जूलॉजिकल पार्क को हासिल है। करीब 76.65 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले कानपुर प्राणी उद्यान में 1250 से अधिक जीव-जन्तु एवं पशु-पक्षी प्रवास करते हैं। ब्रिाटिश शासनकाल में एलेन वन जॉर्ज बर्नी एलेन ने प्राणी उद्यान की कल्पना की थी। जॉर्ज एक प्रसिद्ध ब्रिाटिश उद्योगपति थे। इसे वर्ष 1913-1918 के बीच साधारण तौर पर विकसित किया गया लेकिन इसे आम जनता के लिए नहीं खोला गया। आम जनता के लिए प्राणी उद्यान को 4 फरवरी 1974 को खोला गया।

हालांकि कानपुर प्राणी उद्यान 1971 में खोला गया लेकिन अपेक्षित विकास एवं जनसुरक्षा को ध्यान में रख कर आम जनता के लिए 1974 में खोला गया। ब्रिाटिश इण्डियन सिविल सर्विस के सदस्य सर एलेन प्राकृतिक परिवेश में प्राणी उद्यान खोलना चाहते थे किन्तु उनकी योजना ब्रिाटिशकाल में विधिवत आकार नहीं ले सकी। सर एलेन की जमीन होने के कारण भारत सरकार ने कानपुर प्राणी उद्यान का नामकरण उनके नाम पर ही किया। हालांकि अब इसे कानपुर प्राणी उद्यान के नाम से ही जाना जाता है। इसे शहर का शानदार पिकनिक स्पॉट कह लें या साधारण भाषा में चिड़ियाघर या फिर प्राणी उद्यान कहें।

शहर के आजाद नगर के दक्षिणी हिस्से में विकसित कानपुर प्राणी उद्यान जहां जीवंत पशु-पक्षियों एवं जीव-जन्तुओं से आबाद है तो वहीं डायनासोर जैसे भीमकाय जीव में मूर्तिशिल्प में देखने को मिलते हैं। डायनासोर जैसे भीमकाय जीव भी शहर के कलाकारों ने गढ़े। इस चिड़ियाघर में शेर, चीता, भालू, लकड़बग्घा, उदबिलाव, बाघ, तेंदुआ, गैंड़ा, लंगूर-बंदर, वनमानुष, चिम्पांजी, हिरण, विभिन्न प्रजाति की सर्प, विभिन्न प्रकार के पक्षी-चिड़िया आदि जीव-जन्तु एवं पशु-पक्षी इस प्राणी उद्यान की शोभा हैं। इस चिड़ियाघर के पुराने जीव में चिम्पांजी छज्जू की ख्याति शहर के साथ साथ दूर तक है।

शुतुरमुर्ग, न्यूजीलैण्ड का ऐमू, तोता, सारस, दुलर्भ घडियाल, दरियाई घोड़ा, हाथी-घोड़ा प्राणी उद्यान में हैं तो वहीं हैदराबाद का शेर भी दहाड़ से दर्शकों को रोमांचित करता है। प्राणी उद्यान में मछली घर है तो वहीं रात्रिचर गृह भी विशेष आकर्षण है। रात्रिचर गृह में उन जीव-जन्तुओं को स्थान दिया गया है, जो दिन में दृष्टिपात नहीं कर सकते। पशुओं-जीव-जन्तुओं के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए चिकित्सक की उपलब्धता भी सुनिश्चित है। खास यह है कि प्राणी उद्यान मार्निंग वाकर्स एवं इवनिंग वाकर्स को ताजगी देता है तो वहीं प्राणी उद्यान प्रबंधन सामाजिक भूमिका में भी अग्रणी रहता है। कभी हास्य-व्यंग्य एवं काव्य संगोष्ठियां आयोजित होती हैं तो कभी कमलकार अपनी मेघा से परिवेश को गौरान्वित करते है। कलाकार भी पीछे नहीं रहते। कला प्रतियोगितायें हों या चित्रकला कार्यशाला भी आयोजित होती है। प्राणी उद्यान में विशाल झील भी है। यह झील प्राकृतिक परिवेश को आैर भी अधिक समृद्ध बनाती है।   


Thursday, December 1, 2016

कानपुर का घंटाघर : समय का ख्याल
  
       'घंटाघर" ! जी हां, समय बताने वाला घंटाघर। देश का शायद ही कोई बड़ा एवं पुराना शहर ऐसा नहीं होगा, जहां घंटाघर न हो। देश के अधिसंख्य शहरों में घंटाघरों का निर्माण खास तौर से ब्रिाटिशकाल में किया गया। ब्रिाटिशकाल में आम तौर कलाई घड़ी का प्रचलन नहीं था। यह यूं कहें कि कलाई घड़ी आम आदमी की पहंुच से दूर थीं। लिहाजा हुकूमत ने शहरियों को समय से अवगत कराने के लिए घंटाघरों का निर्माण कराया। कानपुर का घंटाघर भी इसी श्रंखला की धरोहर है।

 घंटाघर चौराहा के मध्य में न होकर दो मुख्य मार्गों के सानिध्य में स्थित है। घंटाघर का निर्माण ब्रिाटिशकाल में किया गया था। कक्षनुमा बने चार मंजिला घंटाघर में वास्तु शास्त्र का भी महत्व देखने को मिलता है तो वहीं मेहराबदार बनावट बताती है कि इसके निर्माण में केवल कानापूरी नहीं की गयी बल्कि पूरी शिद्दत से निर्माण किया गया। घंटाघर के निचले खण्ड में दुकानों की श्रंखला भी है। इन दुकानों को किराया पर आवंटित किया गया है। जिससे भूतल पर व्यावसायिक चहल-पहल रहती है तो वहीं आय से घंटाघर के रखरखाव की व्यवस्था भी होती है। घंटाघर की घड़ी टिकटिक करती रहती है। घंटाघर की घड़ी समय पूरा होने पर शहर को बताती है कि अब कितना समय हुआ है। घंटाघर का रखरखाव कभी कानपुर विकास प्राधिकरण के हाथों में रहा तो कभी कानपुर नगर निगम को सुपुर्द किया गया।

खास बात है कि देश का शायद यह पहला स्थान होगा, जहां घंटाघर चौराहा से नौ प्रमुख मार्ग निकलते-गुजरते हैं। देश के मुख्य रेल मार्ग दिल्ली-हावड़ा को जोड़ने वाले 'कानपुर जंक्शन" से बाहर निकलते ही घंटाघर चौराहा पर होंगे। घंटाघर चौराहा से कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन, यशोदा नगर, डिप्टी पड़ाव, कलक्टरगंज, हालसी रोड, दालमण्डी-नयागंज, मालरोड-एक्सप्रेस रोड (तीन मुख्य मार्ग) सुतरखाना आदि इलाकों से आने-जाने वाली सड़कें जुड़ती हैं। घंटाघर चौराहा पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू की आदमकद प्रतिमा स्थापित है। इसी चौराहा के एक्सप्रेस रोड कार्नर पर किसान नेता चौधरी चरण सिंह की प्रतिमा स्थापित है। करीब दो दशक पहले इस चौराहा का सौन्दर्यीकरण किया गया। कानपुर विकास प्राधिकरण ने चौराहा का न केवल सौन्दर्यीकरण कराया बल्कि क्षेत्र के यातायात को भी सुगम बनाया।