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Monday, December 5, 2016

 कानपुर का जाजमऊ : सूफी संत मखदूम शाह की दरगाह भी एक शान
 
  'ताजमहल" जैसी खूूबसूरती देखनी है तो एक बार कानपुर शहर की जिन्नात की मस्जिद भी देखें। जी हां, भले ही आगरा जैसा पर्यटन स्थल न दिखे लेकिन 'खासियत" में कहीं कोई कमी नहीं मिलेगी। कानपुर शहर का पूर्वी इलाका 'जाजमऊ" के नाम से विख्यात है। 'जाजमऊ" खासियत-खूबियों से लबरेज है।

जाजमऊ में सूफी संत की दरगाह है तो वहीं वास्तुकला के अनुपम उक्करण अवलोकित होते हैं। जाजमऊ की खोदाई में 1200-1300 शताब्दी के बर्तन व कलाकृतियां भी मिलीं। 'जाजमऊ टीला" की खोदाई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने करायी थी। इस खोदाई में असंख्य बहुमूल्यवान वस्तुयें प्राप्त हुयीं। हालांकि वर्तमान में यह कानपुर संग्रहालय में शोभायमान हैं। देश के चमड़ा उत्पादक शहरों में कानपुर का नाम भी शीर्ष पर है। कानपुर का चमड़ा उद्योग खास तौर से जाजमऊ में ही क्रेन्द्रित है। जाजमऊ का टीला प्रसिद्ध है। जाजमऊ का टीला काट कर ही लखनऊ-उन्नाव को जोड़ने वाला शहर का दूसरा पुल बनाया गया। हालांकि यह टीला आज भी अपनी आन-बान-शान के साथ विद्यमान है।

इसी टीला पर ही 'जिन्नात की मस्जिद" है। इस मस्जिद की खूबसूरती वास्तुकला एवं सफेद रंग के लिए प्रसिद्ध है। इस मस्जिद के निर्माण की खास बात यह रही कि एक रात में ही इस मस्जिद का निर्माण हो गया। किसी ने मस्जिद को बनते नहीं देखा। किसी अदृश्य शक्ति ने इसका निर्माण किया। बताते हैं कि हिजरी 1092 में जिन्नात मस्जिद का निर्माण हुआ। इस मस्जिद का इतिहास करीब 350 साल पुराना है। सूफी संत मखदूम शाह बाबा की दरगाह पर शीश नवाने दूर-दराज से लोग जाजमऊ आते हैं। फिरोजशाह तुगलक ने 1358 में मखदूम शाह बाबा का मकबरा बनवाया था।

 मुगलशासक आैरंगजेब के सिपहसलार कुलीच खान ने जाजमऊ इलाके में 1679 के आसपास चार मस्जिदों का निर्माण कराया था। कुलीच खान खुद हैदराबाद के निजाम खानदान से ताल्लुक रखते थे। वर्ष 2006 में शहर को लखनऊ-उन्नाव को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा करने के लिए जाजमऊ की एक बार फिर खोदाई की गयी तो इस खोदाई में पुरातनकाल के बर्तन, कलाकृतियां व अन्य साज-ओ-सामान मिला। इसे कानपुर संग्रहालय में रखा गया। इसी इलाके में हबीबा की मस्जिद भी है। जाजमऊ में लाल बंगला, हरजिन्दर नगर, केडीए मार्केट, डिफेंस कालोनी, पुराना जाजमऊ, चमड़े के कारखाने, वाजिदपुर, जम्मू कश्मीर कालोनी, छबीले पुरवा, गज्जू का पुरवा, पोखरपुर, परदेवनपुरवा, गौशाला, रामेश्वरधाम, विमान नगर, बीबीपुर, जग्गीपुरवा, ग्रेटर कैलाश, चंदननगर, कैलाश नगर व शिवकटरा आदि इलाके-मोहल्ला आदि आते हैं। जाजमऊ में छोटे कारखाना से लेकर बड़ी टेनरी तक करीब तीन सौ चर्म उद्योग संचालित होते हैं। दरगाह-मकबरा में श्रद्धा से शीश नवाते हैं तो बहुसंख्यक रोजगार के अवसर भी उपलब्ध होते हैं। 



Sunday, December 4, 2016


ब्रिटिश सैनिकों की याद-स्मारक
कानपुर मेमोरियल चर्च
 
       'स्वाधीनता आंदोलन" ब्रिटिश हुकूमत के लिए भी कम पीड़ादायक नहीं रहा। स्वाधीनता आंदोलन में जहां एक ओर ब्रिटिश हुक्मरान हिन्दुस्तानियों पर जुल्म ढहाने में पीछे नहीं रहे तो उनको भी 'अपनों" को बड़ी तादाद में खोना पड़ा। चाहे 'बीबीघर काण्ड" हो या फिर 'कानपुर की घेराबंदी" हो। हिन्दुस्तानियों के उग्र तेवर देख कर ब्रिटिश हुक्मरानों के भी होश उड़ गये थे। वर्ष 1875 में 'कानपुर की घेराबंदी" में बड़ी तादाद में ब्रिाटिश सैनिक मारे गये। अफसोस-आक्रोश के अलावा ब्रिाटिश शासक कुछ नहीं कर सके।

मृत सैनिकों के 'स्मरण-याद" में कानपुर के छावनी क्षेत्र में 'कानपुर मेमोरियल चर्च" एवं 'स्मारक उद्यान" का निर्माण किया गया। कानपुर मेमोरियल चर्च को पहले 'ओल सोल्स कैथेड्रल चर्च" के नाम से जाना जाता था। कानपुर क्लब के पास एलबर्ट रोड पर स्थित कानपुर मेमोरियल चर्च का निर्माण मृत ब्रिटिश सैनिकों के याद के साथ ही वास्तु शिल्प का एक विशिष्ट आयाम है। इस चर्च का डिजाइन पश्चिम बंगाल में रेलवे में कार्यरत वास्तुकार वाल्टर ग्रानविले ने किया था। उस समय कानपुर को कावनपुर के नाम से जाना जाता था। लौम्बार्ड संचरना पर बने इस चर्च के एक किनारे ब्रिटिश सैनिक कब्रिस्तान है। इस चर्च के एक हिस्से में स्मारक उद्यान भी है। चर्च में गोथिक शैली भी दिखती है। लाल र्इंट से बना यह चर्च विशेष आकर्षण का केन्द्र है। स्मारक उद्यान को हेनरी यूल ने डिजाइन किया था। इस उद्यान के दो प्रवेश द्वार हैं। खूबसूरत एवं नक्काशीदार परिसर में एक खूबसूूरत परी विशेष आकर्षित करती है। यह स्थल शांति के प्रतीक के तौर पर माना जाता है।

केन्द्र में एक देवदूत की प्रतिमा स्थापित है। इसकी भुजायें एक दूसरे के उपर हो गयी हैं। यह प्रतिमा एक तोरण को थामे है। इसे विश्व शांति का प्रतीक माना जाता है। इस मूर्ति का निर्माण मूर्तिकार बारों कार्लो मारोचेट्टी ने किया था। यह ऐतिहासिक चर्च अपने में असंख्य संस्मरण समेटे है। वर्ष 1875 के बाद संरचनाओं में कई परिवर्तन भी किये गये। चूंकि चर्च को एक स्मारक स्थल के तौर पर देखा जाता है लिहाजा 1857 के सशस्त्र संघर्ष सहित अनेक प्रसंगों को रेखांकित किया गया है। ललित कला के साथ ही मध्ययुगीन विचार धारा भी अवलोकित होती है। इमारत के भीतर कलाकृतियां एवं रेखांकन अतीत से रुबरु कराते हैं।  





Friday, December 2, 2016

देश का तीसरा सबसे बड़ा कानपुर का चिड़ियाघर
'देश का तीसरा सबसे बड़ा चिड़ियाघर" ! जी हां, यह गौरव कानपुर के एलेन फॉरेस्ट जूलॉजिकल पार्क को हासिल है। करीब 76.65 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले कानपुर प्राणी उद्यान में 1250 से अधिक जीव-जन्तु एवं पशु-पक्षी प्रवास करते हैं। ब्रिाटिश शासनकाल में एलेन वन जॉर्ज बर्नी एलेन ने प्राणी उद्यान की कल्पना की थी। जॉर्ज एक प्रसिद्ध ब्रिाटिश उद्योगपति थे। इसे वर्ष 1913-1918 के बीच साधारण तौर पर विकसित किया गया लेकिन इसे आम जनता के लिए नहीं खोला गया। आम जनता के लिए प्राणी उद्यान को 4 फरवरी 1974 को खोला गया।

हालांकि कानपुर प्राणी उद्यान 1971 में खोला गया लेकिन अपेक्षित विकास एवं जनसुरक्षा को ध्यान में रख कर आम जनता के लिए 1974 में खोला गया। ब्रिाटिश इण्डियन सिविल सर्विस के सदस्य सर एलेन प्राकृतिक परिवेश में प्राणी उद्यान खोलना चाहते थे किन्तु उनकी योजना ब्रिाटिशकाल में विधिवत आकार नहीं ले सकी। सर एलेन की जमीन होने के कारण भारत सरकार ने कानपुर प्राणी उद्यान का नामकरण उनके नाम पर ही किया। हालांकि अब इसे कानपुर प्राणी उद्यान के नाम से ही जाना जाता है। इसे शहर का शानदार पिकनिक स्पॉट कह लें या साधारण भाषा में चिड़ियाघर या फिर प्राणी उद्यान कहें।

शहर के आजाद नगर के दक्षिणी हिस्से में विकसित कानपुर प्राणी उद्यान जहां जीवंत पशु-पक्षियों एवं जीव-जन्तुओं से आबाद है तो वहीं डायनासोर जैसे भीमकाय जीव में मूर्तिशिल्प में देखने को मिलते हैं। डायनासोर जैसे भीमकाय जीव भी शहर के कलाकारों ने गढ़े। इस चिड़ियाघर में शेर, चीता, भालू, लकड़बग्घा, उदबिलाव, बाघ, तेंदुआ, गैंड़ा, लंगूर-बंदर, वनमानुष, चिम्पांजी, हिरण, विभिन्न प्रजाति की सर्प, विभिन्न प्रकार के पक्षी-चिड़िया आदि जीव-जन्तु एवं पशु-पक्षी इस प्राणी उद्यान की शोभा हैं। इस चिड़ियाघर के पुराने जीव में चिम्पांजी छज्जू की ख्याति शहर के साथ साथ दूर तक है।

शुतुरमुर्ग, न्यूजीलैण्ड का ऐमू, तोता, सारस, दुलर्भ घडियाल, दरियाई घोड़ा, हाथी-घोड़ा प्राणी उद्यान में हैं तो वहीं हैदराबाद का शेर भी दहाड़ से दर्शकों को रोमांचित करता है। प्राणी उद्यान में मछली घर है तो वहीं रात्रिचर गृह भी विशेष आकर्षण है। रात्रिचर गृह में उन जीव-जन्तुओं को स्थान दिया गया है, जो दिन में दृष्टिपात नहीं कर सकते। पशुओं-जीव-जन्तुओं के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए चिकित्सक की उपलब्धता भी सुनिश्चित है। खास यह है कि प्राणी उद्यान मार्निंग वाकर्स एवं इवनिंग वाकर्स को ताजगी देता है तो वहीं प्राणी उद्यान प्रबंधन सामाजिक भूमिका में भी अग्रणी रहता है। कभी हास्य-व्यंग्य एवं काव्य संगोष्ठियां आयोजित होती हैं तो कभी कमलकार अपनी मेघा से परिवेश को गौरान्वित करते है। कलाकार भी पीछे नहीं रहते। कला प्रतियोगितायें हों या चित्रकला कार्यशाला भी आयोजित होती है। प्राणी उद्यान में विशाल झील भी है। यह झील प्राकृतिक परिवेश को आैर भी अधिक समृद्ध बनाती है।   


Thursday, December 1, 2016

कानपुर का घंटाघर : समय का ख्याल
  
       'घंटाघर" ! जी हां, समय बताने वाला घंटाघर। देश का शायद ही कोई बड़ा एवं पुराना शहर ऐसा नहीं होगा, जहां घंटाघर न हो। देश के अधिसंख्य शहरों में घंटाघरों का निर्माण खास तौर से ब्रिाटिशकाल में किया गया। ब्रिाटिशकाल में आम तौर कलाई घड़ी का प्रचलन नहीं था। यह यूं कहें कि कलाई घड़ी आम आदमी की पहंुच से दूर थीं। लिहाजा हुकूमत ने शहरियों को समय से अवगत कराने के लिए घंटाघरों का निर्माण कराया। कानपुर का घंटाघर भी इसी श्रंखला की धरोहर है।

 घंटाघर चौराहा के मध्य में न होकर दो मुख्य मार्गों के सानिध्य में स्थित है। घंटाघर का निर्माण ब्रिाटिशकाल में किया गया था। कक्षनुमा बने चार मंजिला घंटाघर में वास्तु शास्त्र का भी महत्व देखने को मिलता है तो वहीं मेहराबदार बनावट बताती है कि इसके निर्माण में केवल कानापूरी नहीं की गयी बल्कि पूरी शिद्दत से निर्माण किया गया। घंटाघर के निचले खण्ड में दुकानों की श्रंखला भी है। इन दुकानों को किराया पर आवंटित किया गया है। जिससे भूतल पर व्यावसायिक चहल-पहल रहती है तो वहीं आय से घंटाघर के रखरखाव की व्यवस्था भी होती है। घंटाघर की घड़ी टिकटिक करती रहती है। घंटाघर की घड़ी समय पूरा होने पर शहर को बताती है कि अब कितना समय हुआ है। घंटाघर का रखरखाव कभी कानपुर विकास प्राधिकरण के हाथों में रहा तो कभी कानपुर नगर निगम को सुपुर्द किया गया।

खास बात है कि देश का शायद यह पहला स्थान होगा, जहां घंटाघर चौराहा से नौ प्रमुख मार्ग निकलते-गुजरते हैं। देश के मुख्य रेल मार्ग दिल्ली-हावड़ा को जोड़ने वाले 'कानपुर जंक्शन" से बाहर निकलते ही घंटाघर चौराहा पर होंगे। घंटाघर चौराहा से कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन, यशोदा नगर, डिप्टी पड़ाव, कलक्टरगंज, हालसी रोड, दालमण्डी-नयागंज, मालरोड-एक्सप्रेस रोड (तीन मुख्य मार्ग) सुतरखाना आदि इलाकों से आने-जाने वाली सड़कें जुड़ती हैं। घंटाघर चौराहा पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू की आदमकद प्रतिमा स्थापित है। इसी चौराहा के एक्सप्रेस रोड कार्नर पर किसान नेता चौधरी चरण सिंह की प्रतिमा स्थापित है। करीब दो दशक पहले इस चौराहा का सौन्दर्यीकरण किया गया। कानपुर विकास प्राधिकरण ने चौराहा का न केवल सौन्दर्यीकरण कराया बल्कि क्षेत्र के यातायात को भी सुगम बनाया।    


Wednesday, November 30, 2016


स्वाधीनता आंदोलन : बूढ़ा बरगद
आजादी के दीवानों का शहादत स्थल
इसी बरगद पर 135 क्रांतिकारियों को ब्रिटानिया हुकूमत ने दी थी एक साथ फांसी
 
       'स्वाधीनता आंदोलन" में हिन्दुस्तानियों पर कम जुल्म नहीं हुये। फिर भी हिन्दुस्तानियों ने ब्रिाटानिया हुकूमत के दांत खट्टे कर दिये थे। इसके लिए भले ही आजादी के दीवानों को जान की कीमत चुकानी पड़ी हो। शय-मात के इस द्वंद में ब्रिटानिया हुकूमत को हर बार हिन्दुस्तानियों से जबर्दस्त टक्कर मिलती थी। 'मेमोरियल वेल" में दो सौ अंग्रेज महिलाओं व बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया तो ब्रिटानिया हुकूमत बौखला गयी। कानपुर शहर का 'कम्पनी बाग" (अब नानाराव पार्क) हिन्दुस्तानियों के लिए यातना केन्द्र बन गया था। हिन्दुस्तानियों के खिलाफ दण्डात्मक कार्यवाही के फैसले से लेकर अमल तक इसी कम्पनी बाग में होते थे। शहर व गंगा नदी के मध्य क्षेत्र में स्थित नानाराव पार्क अतीत का गवाह बन गया। नानाराव पार्क ने हिन्दुस्तानियों पर अनेक जुल्म देखे। 'कोई साक्षी नहीं-कोई गवाह नहीं...." बस सिर्फ ब्रिटानिया हुकूमत के हुक्मरानों के मनमाने व बदला लेने वाले फैसले होते। 'बूढ़ा बरगद" अब तो उसकी भी कमर टूट गयी। स्वाधीनता आंदोलन के क्रांतिकारियों को उसी की शाखाओं पर फांसी दी गयी। 'बूढ़ा बरगद" अब बूढ़ा हुआ लेकिन तब तो जवान था। खुद के शहर के बाशिंदों को फांसी पर लटका कर 'बरगद" भी कांप उठा था... मन ही मन खूब फफक-फफक कर रोया... पर उसकी कौन सुनने वाला था। क्रांति के दौरान 1857 से 1947 तक यह स्थान फांसी स्थल बना रहा। ब्रिटानिया हुकूमत को जिस पर शक हुआ, उसे फांसी पर लटका दिया। हिन्दुस्तानियों को इस क्षेत्र में प्रवेश की इजाजत नहीं थी। अंग्रेज अफसर किसी को पकड़ कर इस क्षेत्र में ले जाते तो मान लिया जाता कि उसे अब फांसी दी जायेगी। 'बीबीघर" काण्ड के बाद बौखलाये ब्रिाटिश शासन ने 135 (एक सौ पैंतीस) क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी दी थी। उस दिन यह बूढ़ा बरगद चित्कार उठा था.... अब बस बहुत हो चुका.... । आक्रोश दोनों तरफ था। दो सौ महिलाओं व बच्चों को मौत के घाट उतार जाने से अंग्रेज बौखला गये थे तो वहीं बूढ़ा बरगद पर 135 क्रांतिकारियों को सामूहिक फांसी दिये जाने से हिन्दुस्तानी बेहद आक्रोश में थे। इंग्लैण्ड में सड़कों पर नानाराव पेशवा के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे तो हिन्दुस्तान में आंदोलन पर तेज हो रहा था। आक्रोश से बचने के लिए किसी भी अंग्रेज अफसर ने इस फांसी का कहीं कोई जिक्र नहीं किया। यह बरगद आैर मिट्टी न केवल स्वाधीनता आंदोलन व क्रांतिकारियों की फांसी का गवाह है। आजादी के बाद बूढ़ा बरगद स्थल को 'शहीद उपवन" के तौर पर जाना जाने लगा।

शहीद उपवन का शिलाखण्ड आज भी दास्तां को बयां करता है। शहीद उपवन का यह बूढ़ा बरगद आज भी दर्द बयां करता है। 'आखिर क्यों जानना चाहते हो मेरे (बूढ़ा बरगद) बारे में ...... सुनो... मैं केवल जड़, तना व पत्तियों से युक्त वटवृक्ष ही नहीं हूं बल्कि गुलाम भारत से आज तक के इतिहास का साक्षी हूं। मैंने (बूढ़ा बरगद) अनगिनत बसन्त व पतझड़ देखे, 4 जून 1857 का वह दिन भी जब मेरठ से सुलगती आजादी की चिंगारी कानपुर में शोला बन गई। मैने नाना साहब की अगुवाई में तात्या टोपे की वीरता देखी, रानी लक्ष्मी बाई का बलिदान देखा आैर देखी अजीमुल्ला खां की शहादत, मुझे वह दिन भी याद है, जब बैरकपुर छावनी में मेरे सहोदर पर लटकाकर क्रांति के अग्रदूत मंगल पाण्डे को फांसी दी गई जिससे देशवासी दहल उठे। देश की आजादी के दीवानों पर क्रूर एवं दमनपूर्ण कहर ढ़ाने वालों से मेरी जड़ें तक हिल गर्इं। वह दिल दहलाने वाला दिन आज भी नहीं भूल पाता, जब 135 देश भक्तों को अंग्रेजों ने मेरी ही शाखाओं पर फांसी के फंदे पर लटकाया। उस दिन मैं थर्राया, बहुत चीखा-चिल्लाया, चीखते-चीखते गला रुंध गया। आंख के आंसू रो-रोकर सूूख गये। यह रोमांच-कारी दर्द भरी दास्तान याद आते ही मैं कराह उठता हूं। तुम्हारा बूढ़ा बरगद।
यह शिलालेख बहुत कुछ याद दिलाता है। शहीद उपवन में एक अजीब सी खामोशी आज भी विद्यमान रहती है। हालांकि मार्निंग वाकर्स व इवनिंग वाकर्स से उपवन सुबह व सांझ आबाद रहता है। फिर स्वाधीनता आंदोलन की गौरव गाथा सुन कर स्मरण कर तन-मन.... रोम-रोम झंकृत हो जाता है।       



Tuesday, November 29, 2016


नानाराव पार्क : आजादी के इतिहास का गवाह 
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मतवालों की प्रतिमायें
आक्सीजन क्लाइमेट : मार्निंग वाकर्स की पसंद
        
कानपुर शहर की गलियां-चौबारे भले ही कंक्रीट के जंगलों में दब्दील हो रहे हों लेकिन अभी भी फेफडों के लिए आक्सीजन की कमी नहीं। जी हां, शहर के घनी आबादी वाले इलाकों खास तौर से नयागंज, जनरलगंज, कमला टावर, सिरकी मोहाल सहित दर्जनों इलाकों में पार्क या तो खत्म हो गये या फिर बदइंतजामी का शिकार हो गये। शहर की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इन इलाको में ही बसता है। लाजिमी है कि आक्सीजन की कमी महसूस होगी लेकिन इसी इलाके का ऐतिहासिक नानाराव पार्क शहरियों को भरपूर आक्सीजन उपलब्ध कराता है। समय ने रंग बदले पार्क के नाम बदलते रहे। कभी इसे 'मेमोरियल वेल" कहा गया तो कभी कम्पनी बाग के नाम से जाना गया तो अब इसे "नानाराव पार्क" पुकारा जाता है। 'नानाराव पार्क" अर्थात 'आक्सीजन क्लाइमेट"। कानपुुर के मॉल रोड इलाके का यह पार्क सुबह हो सांझ एक निराले अंदाल में ही दिखता है। मार्निंग वाकर्स व इवनिंग वाकर्स की चहल-पहल बनी रहती है।

ब्रिटिशकाल में इसे 'मेमोरियल वेल" के तौर पर जाना गया क्योंकि 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन में नाना साहब पेशवा व आजादी के दीवानों ने लगभग दो सौ ब्रिाटिश महिलाओं एवं बच्चों को इस वेल (कुंआ) में जिंदा डाल दिया था। यह नरसंहार जहां हुआ, उसे बीबीघर कहा जाता था। ब्रिाटिश हुकूमत ने बदला लेने की मंशा से भारतीय जनमानस के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए इस एकांत क्षेत्र का उपयोग किया। अंतोगत्वा, भारत सरकार ने आजादी के बाद 'ब्रिाटिश स्मारक" को ध्वस्त करा दिया। नानाराव पार्क के मॉल रोड वाले हिस्से में शहीद उद्यान बनाया गया। शहीद उद्यान में तात्या टोपे, अजीजा बाई व झांसी की रानी आदि की मूर्तियां प्रतिष्ठापित हैं। यह उद्यान खास तौर से 'भारतीय स्वतंत्रता संग्राम" के नाम है। नानाराव पार्क को वाकई पर्यावरण संवर्धित पार्क कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। इस पार्क के रखरखाव का उत्तरदायित्व स्थानीय निकाय के हाथ में है।                                                                 प्रकाशन तिथि 29.11.2016

Monday, November 28, 2016


 मोतीझील : आबादी को भरपूर आक्सीजन
  करगिल 'शहीद स्तम्भ" नमन स्थल
 
       'मोतीझील" शहर का एक शानदार सैर-सपाटा-पर्यटन स्थल तो वहीं राष्ट्र को समर्पित 'शहीद स्तम्भ"। जी हां, बात चाहे मार्निंग वाकर्स की हो या घूमने-फिरने आने वाले सैलानियों की हो..... शहर के बाशिंदों की पसंदगी में मोतीझील अपना अलग मुकाम रखता है। कानपुर के इस मोतीझील के बहुआयामी उपयोग साफ तौर पर दिखते हैं। अमर शहीद स्तम्भ तो वहीं शहर की एक बड़ी आबादी को पीने का पानी भी इसी झील से उपलब्ध होता है। मोतीझील में मुुख्य तौर पर दो बड़े जलाशय हैं। इस झील से बेनाझाबर को करीब आठ करोड़ लीटर पेयजल दैनिक उपलब्ध होता है। इससे शहर की एक बड़ी आबादी अपनी प्यास बुझाती है।

विशेषज्ञों की मानें तो 'मोतीझील" शहर के फेफड़ों का कार्य करती है। मंद-मंद प्रवाहमान हवा के झोके निश्चय ही मन-मस्तिष्क को प्रफुल्लित व तन-मन को तरोताजा कर देती है। ब्रिाटिशकाल में मोतीझील अस्तित्व में दिखी। अब हालात यह हैं कि मोतीझील को शहर का गौरव कहा जाए या आकर्षण तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। मुन्सिपेलटी ने वर्ष 1891 में कानपुुर शहर की आबादी को पीने का पानी उपलब्ध कराने पर विचार-विमर्श-मंथन किया। कानपुुर की आबादी उस वक्त अभिलेखीय अनुसार 151444 थी। एरिया भी 109230 था। इंजीनियर ए जे ह्यू ने पेयजल की योजना को आकार दिया। तय हुआ कि रानीघाट गंगा नदी से स्टीम इंजन के जरिये पीने का पानी लाया जायेगा। बृजेन्द्र स्वरुप पार्क को पूर्व में आवर झील के तौर पर जाना जाता था। यह इलाका खास तौर बेहना बाहुल्य था लिहाजा इसे बेनाझाबर के नाम से जाना जाने लगा।

वर्ष 1795 में रामपुर से दो सूबेदार भाई अबदुल्लाह खां एवं सादुल्लाह खां शहर आ कर बसे थे। लिहाजा इनकी सम्पत्तियां शहर में थीं। घुसरामऊ गांव का करीब चार मील का एरिया पेयजल की व्यवस्थाओं के लिए अधिग्रहीत किया गया था। वर्ष 1892 में इस परियोजना ने विधिवत कार्य प्रारम्भ किया। इसका विधिवत उद्घाटन एक मार्च 1894 को संयुक्त प्रांत के लेफ्टीनेंट गर्वनर रास्चार्ज कुस्थवेट ने किया था। मुन्सिपेलटी के चेयरमैन 1891 से 1894 तक एच एम वर्ड रहे। इसके बाद 1916 में मुन्सिपेलटी एक्ट बना। चुनाव हुए जिसमें रायबहादुर बाबू बिहारी लाल पटेल चेयरमैन निर्वाचित हुये। इसी दौरान मोतीलाल नेहरु कांग्रेस के प्रमुख बने। अंग्रेज इसे वाटर वक्र्स कहते थे तो हिन्दुस्तानी बेनाझाबर कहते थे। मोतीलाल की पत्नी स्वरुप रानी के नाम से स्वरुप नगर बसा। टाउनहाल में मुन्सिपेलटी दफ्तर छोटा पड़ने लगा तो वर्ष 1958 में मोतीझील में दफ्तर के लिए इमारत का निर्माण हुआ। घुसरामऊ नाम पसंद न आने पर इस इलाके को मोतीझील कहा जाने लगा।

वर्ष 1999 में एक बार फिर मोतीझील का बहुआयामी विकास रंगत लेते दिखा। 'करगिल युद्ध विजय" के बाद मोतीझील में 'शहीद स्तम्भ" बना। शहीद स्तम्भ में करगिल युद्ध के अमर शहीद सैनिकों के नाम अंकित किये गये। तत्कालीन आवास एवं नगर विकास मंत्री लाल जी टण्डन ने विधिवत उद्घाटन किया। कानपुर विकास प्राधिकरण के तत्कालीन उपाध्यक्ष नरेश नन्दन प्रसाद के नेतृत्व में मोतीझील के कलेवर बदले। दोनो झील में फव्वारा लगे तो वहीं मोतीझील को चौतरफा पेड़-पौधों से सुसज्जित किया गया। मोतीझील में नौकायन की व्यवस्था की गयी। मोतीझील शहर का एक शानदार पार्क, एक शानदार पर्यटन स्थल, शहीद स्तम्भ. मार्निंग वाकर्स प्वांइट आदि बहुत कुछ है। कानपुर मोतीझील को शहर का फेफड़ा कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। मार्निंग वॉक के लिए सुबह-सांझ शहर के विभिन्न इलाकों से शहर के बाशिंदे आते हैं।              प्रकाशन तिथि 28.11.2016